कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित चैतुरगढ़ मंदिर धार्मिक आस्था, प्राचीन इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता का अनूठा संगम है। पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित यह ऐतिहासिक स्थल मां महिषासुर मर्दिनी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इसे लाफागढ़ के नाम से भी जाना जाता है। चैतुरगढ़ न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक धरोहरों में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

चैतुरगढ़ का इतिहास प्राचीन छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला और राजसत्ता से जुड़ा हुआ है। कोरबा जिला प्रशासन के अनुसार, इस किले का निर्माण राजा पृथ्वीदेव प्रथम ने कराया था। इसकी प्राकृतिक बनावट इसे अन्य किलों से अलग पहचान देती है। यह किला ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। पहाड़ी की प्राकृतिक संरचना ही इसकी सुरक्षा का प्रमुख आधार रही होगी। किले के कुछ हिस्सों में सुरक्षा के लिए दीवारें भी बनाई गई थीं। छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग ने चैतुरगढ़ के किले और मंदिर को संरक्षित ऐतिहासिक धरोहर के रूप में दर्ज किया है। इसे 17 दिसंबर 1920 को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था।

चैतुरगढ़ की सबसे बड़ी पहचान यहां स्थित मां महिषासुर मर्दिनी का प्राचीन मंदिर है। मंदिर के गर्भगृह में देवी की बारह भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित है। मां महिषासुर मर्दिनी को शक्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध करके देवताओं और संसार को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इसी विजय के कारण देवी को महिषासुर मर्दिनी कहा जाता है। चैतुरगढ़ में स्थापित देवी की प्रतिमा और मंदिर की स्थापत्य शैली इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाती है।

चैतुरगढ़ का प्राचीन किला अपनी भौगोलिक संरचना के कारण विशेष महत्व रखता है। पहाड़ी की प्राकृतिक बनावट ने इसे मजबूत सुरक्षा प्रदान की। किले के तीन प्रमुख प्रवेश द्वारों का उल्लेख मिलता है - मेनका द्वार, हुंकारा द्वार और सिंहद्वार। छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग के विवरण में प्रवेश द्वारों के स्थानीय नामों के कुछ अलग रूप भी मिलते हैं। किले की संरचना से पता चलता है कि प्राचीन समय में प्राकृतिक परिस्थितियों का उपयोग सुरक्षा व्यवस्था के लिए किया जाता था।

यह केवल मंदिर और किले तक सीमित नहीं है। यहां पहाड़ी के ऊपर समतल क्षेत्र, तालाब और प्राकृतिक गुफाएं भी हैं। पहाड़ी के ऊपरी हिस्से में पांच तालाब हैं, जिनमें से तीन में सालभर पानी रहने का उल्लेख किया गया है। मंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर शंकर गुफा स्थित है। यह गुफा सुरंग जैसी बनावट वाली है और लगभग 25 फीट लंबी बताई गई है। ये प्राकृतिक संरचनाएं चैतुरगढ़ के ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व को दर्शाती हैं।

चैतुरगढ़ मंदिर में नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मां महिषासुर मर्दिनी के दर्शन के लिए श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। भक्त मां दुर्गा को शक्ति, साहस और संकटों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजते हैं।

मंदिर के पुजारी हरीश कुमार पांडेय ने आईएएनएस को बताया, "माता की सेवा करते हुए 17 साल हो गए। महिषासुर राक्षस को मारने के बाद माता इस जगह पर आकर विराजमान हुई हैं। उन्होंने राजा को सपने में बोला था कि वे यहां पर मंदिर बनाए। जब वे यहां आए तो देखा कि माता की भव्य मूर्ति रखी हुई थी। उसके बाद उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया। साथ ही तालाब बनवाया। सात किलोमीटर तक बाउंड्रीवाल कराकर किले का निर्माण कराया था। 2.5 किमी दूर भगवान शिव की गुफा है, जिसमें 35 फीट घुटनों के बल जाने पर भगवान शंकर मिलेंगे। मंदिर में आने के तीन गेट हैं, जबकि चौथा गुप्त द्वार है।"

एक महिला श्रद्धालु ने कहा, "मैं दूसरी बार यहां आई हूं। माता का दर्शन करके बहुत अच्छा लगा। मां का स्वरूप बहुत ही अच्छा है; वे अपने श्रद्धालुओं की सभी मन्नत पूरी करती हैं।"

एक अन्य श्रद्धालु ने बताया कि मंदिर आने पर बहुत सुकून मिल रहा है और वह पूरे परिवार के साथ यहां आया है।