औरंगाबाद। बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित ऐतिहासिक पुनपुन घाट पर इन दिनों आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। 15 दिवसीय पितृपक्ष मेले के अवसर पर देश-विदेश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आदिगंगा के नाम से विख्यात पुनपुन नदी के तट पर पहुंच रहे हैं। यहां अपने पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए पिंडदान कर श्रद्धालु गया जी के लिए प्रस्थान कर रहे हैं। पुनपुन घाट पर मौजूद तीर्थ पुरोहित ने आईएएनएस को बताया कि पितृपक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तिथि तक मनाया जाता है। इस दौरान पितरों को सद्गति प्रदान करने के लिए श्राद्ध का विशेष आयोजन किया जाता है। यह जगह आदिगंगा है। गयाजी जाने से पहले यहां पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे पितृ कर्म किए जाते हैं। ऐसा करने से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है और उनके वंशजों को सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा, "पुराणों में कुल 45 वेदियों की कथा है, जिसमें पांच तीर्थ बहुत प्रमुख हैं - सीता कुंड, फल्गु तीर्थ, विष्णु पद, प्रेत शिला और आदि गंगा पुनपुन।" एक अन्य विद्वान ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि पूर्वज पृथ्वी लोक पर भटकते रहते हैं और उन्हें मोक्ष नहीं मिलता। मोक्षदायिनी गया जी में पिंडदान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण के अनुसार पुत्र होने का महत्व भी इसी से जुड़ा है। पितृ ऋण से तभी मुक्ति मिलती है जब पुत्र अपने माता-पिता का श्राद्ध करे। मध्य प्रदेश के सतना से आए एक श्रद्धालु ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "हम अपने पिताजी का पिंडदान करने आए हैं। हमारे पूर्वज बताते हैं कि बिना पुनपुन में पिंडदान किए गया जी का श्राद्ध अधूरा है। हिंदू धर्म में इसकी बहुत बड़ी आस्था है। गया श्राद्ध करने से हमारे पितरों को मुक्ति मिलती है।" ग्वालियर से आई एक महिला श्रद्धालु ने कहा, "जो हमारे बड़े-बुजुर्ग बताते हैं, उसी परंपरा के अनुसार हम यहां पूजा-पाठ और जल अर्पण करने आए हैं ताकि हमारे पितरों की आत्मा को शांति मिले। मैं अपने ससुर, सास और बाबा ससुर का श्राद्ध करने आई हूं।" एक अन्य महिला ने बताया कि वह अपने बेटे के साथ अपने पति का श्राद्ध करने के लिए पुनपुन तट पर पहुंची हैं। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार मगध क्षेत्र की प्रथम वेदी मानी जाने वाली आदिगंगा पुनपुन के तट पर पिंडदान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि त्रेता काल में भगवान श्री राम ने भी अपने पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए गया जी में श्राद्ध किया था, वहीं द्वापर काल में महाभारत के युद्ध के उपरांत पांडवों ने भी अपने पितरों और युद्ध में मारे गए स्वजनों की आत्मा की शांति के लिए गया जी में आकर पिंडदान किया था। तब से आज तक यह परंपरा अनवरत चली आ रही है। हिंदू धर्म शास्त्रों वायु पुराण एवं पद्म पुराण में भी भगवान राम के गया श्राद्ध का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन पुराणों में उल्लेख है कि भगवान राम तथा माता सीता ने गया क्षेत्र की प्रथम वेदी कही जाने वाली आदि गंगा पुनपुन के तट पर अपने पितरों के मोक्ष हेतु सबसे पहले पिंडदान किया था। पिंडदान के उपरांत उन्होंने मां उमगेश्वरी की पर्वत श्रृंखला क्षेत्र में रात्रि विश्राम किया था, जिसे आज हम सीता थापा के नाम से जानते हैं। आज भी वहां माता सीता के हाथ के निशान मौजूद होने की मान्यता है, जिसके दर्शन के लिए सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह स्थान आज औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड की मदनपुर पहाड़ी पर स्थित है, जहां से दूसरे दिन भगवान राम गया जी के लिए प्रस्थान किए थे।
बोधगया। बिहार के गया जिले में स्थित बोधगया दुनिया भर में भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली और यूनेस्को विश्व धरोहर महाबोधि मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि बोधगया का पितृपक्ष और श्राद्धकर्म की परंपरा से भी गहरा संबंध है। सनातन परंपरा के अनुसार यहां पितृ तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है और पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पहुंचते हैं। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार माना गया है। यही कारण है कि महाबोधि मंदिर परिसर में वर्षों से पिंडदान और तर्पण की परंपरा चली आ रही है। पितृपक्ष के दौरान प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर, मुचलिंद सरोवर और आसपास के पवित्र स्थलों पर वैदिक विधि-विधान के साथ श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार बोधगया में तीन प्रमुख पिंडवेदी का विशेष महत्व है- धर्मारण्य, मातंगवापी और सरस्वती। माना जाता है कि इन स्थलों पर पिंडदान करने से पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है। स्कंद पुराण में सरस्वती पिंडवेदी के समीप स्थित मुहाने नदी में तर्पण का विधान भी वर्णित है, इसलिए पितृपक्ष में यहां विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं। महाबोधि मंदिर परिसर में पिंडदान की परंपरा भी काफी पुरानी मानी जाती है। स्थानीय जानकार बताते हैं कि 1980 के दशक से पहले निरंजना नदी पर पुल नहीं होने के कारण श्रद्धालु धर्मारण्य, मातंगवापी और सरस्वती वेदी पर कर्मकांड पूरा करने के बाद महाबोधि मंदिर पहुंचकर पिंडदान की अंतिम प्रक्रिया संपन्न करते थे। इसके बाद वे भगवान बुद्ध के दर्शन करते और पवित्र बोधिवृक्ष को नमन कर अपने धार्मिक अनुष्ठान का समापन करते थे। यह परंपरा आज भी अनेक श्रद्धालुओं द्वारा निभाई जाती है। पितृपक्ष के दौरान बोधगया का धार्मिक वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। सुबह से शाम तक मंदिर परिसर और आसपास के घाटों पर वैदिक मंत्रोच्चार गूंजता रहता है। विभिन्न राज्यों से आए पुरोहित श्रद्धालुओं को विधि-विधान के अनुसार पिंडदान और तर्पण कराते हैं। मान्यता है कि गया और बोधगया में किए गए श्राद्ध से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। धार्मिक दृष्टि से गया और बोधगया एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। जहां गया का विष्णुपद मंदिर पिंडदान का प्रमुख केंद्र है, वहीं बोधगया में बुद्ध की ज्ञानभूमि पर पितृ तर्पण की परंपरा सनातन और बौद्ध विरासत के अद्भुत संगम का प्रतीक मानी जाती है। यही वजह है कि कई श्रद्धालु विष्णुपद मंदिर में पिंडदान करने के बाद बोधगया पहुंचकर महाबोधि मंदिर में दर्शन और तर्पण करते हैं। हालांकि, महाबोधि मंदिर परिसर में पिंडदान की परंपरा को लेकर अतीत में विवाद भी सामने आया था। 1990 के दशक में अखिल भारतीय महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन समिति ने मंदिर परिसर में पिंडदान पर रोक लगाने की मांग की थी। समिति का तर्क था कि मंदिर परिसर में इस तरह के कर्मकांड नहीं होने चाहिए। लेकिन तत्कालीन मंदिर प्रबंधन ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपरा को जारी रखा। इसके बाद भी मंदिर परिसर में पिंडदान की प्रक्रिया निरंतर चलती रही। पितृपक्ष के अवसर पर बोधगया में प्रशासन की ओर से भी विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सुरक्षा, यातायात, पेयजल, स्वास्थ्य और पूजा स्थलों पर अतिरिक्त इंतजाम किए जाते हैं। बड़ी संख्या में आने वाले तीर्थयात्रियों को विभिन्न पिंडवेदी और तर्पण स्थलों तक पहुंचाने के लिए विशेष मार्गदर्शन की व्यवस्था भी रहती है। धार्मिक आस्था, सनातन परंपरा और भगवान बुद्ध की ज्ञानभूमि का संगम बोधगया को पितृपक्ष के दौरान एक विशिष्ट तीर्थ के रूप में स्थापित करता है।
गयाजी। पितृपक्ष के दौरान बिहार का गयाजी दुनिया भर के सनातन श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गयाजी में पिंडदान और तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि हर साल देश-विदेश से लाखों लोग अपने पूर्वजों के निमित्त यहां पहुंचते हैं। शास्त्रों में गयाजी को पितृ कर्म के लिए सर्वोच्च तीर्थ बताया गयाजी है और कहा जाता है कि यहां विधि-विधान से पिंडदान करने पर सात पीढ़ियों तक के पितरों का उद्धार होता है। गयाजी की महत्ता केवल विष्णुपद मंदिर या फल्गु नदी तक सीमित नहीं है। पूरे गयाजी क्षेत्र में 45 से अधिक ऐसे पवित्र स्थल हैं, जहां पिंडदान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इन सभी स्थानों का अपना अलग धार्मिक महत्व माना जाता है और अलग-अलग प्रकार के पितृ दोषों तथा पारिवारिक बाधाओं से मुक्ति की मान्यता जुड़ी हुई है। गयाजी का विष्णुपद मंदिर पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु के चरणचिह्न स्थापित हैं। श्रद्धालु मंदिर परिसर में पिंड अर्पित कर अपने पितरों के मोक्ष की कामना करते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यहां किया गयाजी पिंडदान विशेष फलदायी माना जाता है। फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। मान्यता है कि माता सीता ने इसी नदी के किनारे अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान किया था। इसलिए फल्गु नदी में तर्पण करने से पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलने की मान्यता है। गयाजी का अक्षयवट एक अमर वटवृक्ष माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को स्थायी शांति मिलती है और परिवार पर पितरों का आशीर्वाद बना रहता है। इसी कारण इसे गयाजी के सबसे महत्वपूर्ण पिंडदान स्थलों में गिना जाता है। प्रेतशिला पर्वत का संबंध उन लोगों से जोड़ा जाता है जिनकी मृत्यु असामान्य या अकाल परिस्थितियों में हुई हो। ऐसी आत्माओं की शांति के लिए यहां पिंडदान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे प्रेत बाधा और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। रामशिला पर्वत को भगवान राम के पिंडदान से जुड़ा स्थान माना जाता है। मान्यता है कि भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ के निमित्त यहां श्राद्ध कर्म किया था। इसलिए यहां पिंडदान करने से पारिवारिक सुख-समृद्धि और पितरों की कृपा प्राप्त होती है। सीता कुंड गयाजी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। मान्यता है कि माता सीता ने यहां पितृ कर्म संपन्न किया था। श्रद्धालु इस स्थान पर पिंडदान और तर्पण कर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं। ब्रह्मयोनि पर्वत, धर्मारण्य, मंगला गौरी, उत्तरमानस, सूर्यकुंड और वैतरणी समेत कई अन्य पवित्र स्थान भी गयाजी के पिंडदान स्थलों में शामिल हैं। धार्मिक मान्यता है कि इन स्थानों पर किए गए श्राद्ध और तर्पण से अलग-अलग प्रकार के पितृ दोष, ग्रह बाधाएं और पारिवारिक कष्ट दूर होते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार गयाजी में विधिपूर्वक पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वंशजों को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। इसी कारण पितृपक्ष के 16 दिनों में गयाजी में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या उमड़ती है। मान्यता है कि यहां श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए पिंडदान का पुण्य कभी क्षीण नहीं होता और पितरों का आशीर्वाद पूरे परिवार पर बना रहता है।
वाराणसी। पितृ पक्ष पर काशी के प्रसिद्ध पिशाचमोचन कुंड पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। पितृ पक्ष के पहले दिन से ही देश के कोने-कोने से आए लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति, पितृ ऋण से मुक्ति और मोक्ष की कामना के लिए यहां तर्पण और पिंडदान करते नजर आए। मान्यता है कि इस कुंड पर पिंडदान करने से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।पिशाचमोचन कुंड परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ लगी है। लोगों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अपने पितरों का तर्पण किया, पिंडदान किया और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-पुण्य कर रहे हैं। इस दौरान पुजारी नीरज कुमार ने आईएएनएस से बात करते हुए बताया, "इस बार पितृ पक्ष चौदह दिन का है, लेकिन सामान्य तौर पर यह पंद्रह दिन का होता है। कल श्राद्ध पूर्णिमा थी और आज से पितृ पक्ष का पहला दिन शुरू हुआ है, जिसे प्रतिपदा श्राद्ध कहा जाता है। यह दिन पितरों को समर्पित है। आज के दिन श्रद्धालु अपने पूर्वजों के नाम का श्राद्ध, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराते हैं।" उन्होंने पिशाचमोचन कुंड के महत्व के बारे में बताते हुए बताया कि काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। कहावत है - 'मरने को देश है, तरने को काशी'। काशी में मरने वाले को तो मोक्ष मिलता ही है, लेकिन जो काशी के बाहर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनकी मुक्ति के लिए पिशाचमोचन कुंड है। मान्यता है कि यहां पर आकर यदि कोई अपने पितरों का पिंडदान और तर्पण करता है, तो उन्हें भी मुक्ति मिल जाती है। यह व्यवस्था स्वयं परमेश्वर महादेव द्वारा बनाई गई है। आज के दौर में ऑनलाइन श्राद्ध की बढ़ती परंपरा पर पुजारी नीरज कुमार ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पितृ पक्ष में दान-पुण्य का विशेष फल मिलता है, लेकिन श्राद्ध हमेशा अपने हाथों से ही करना चाहिए। उन्होंने कहा, "आजकल लोग ऑनलाइन श्राद्ध की व्यवस्था करने लगे हैं, लेकिन ऑनलाइन श्राद्ध नहीं होना चाहिए। जैसे मैं ऑनलाइन भोजन नहीं कर सकता, वैसे ही ऑनलाइन श्राद्ध भी नहीं हो सकता। श्राद्ध का अर्थ है पितरों को भोजन देना और भोजन हमेशा अपने हाथ से ही दिया जाता है।" उन्होंने श्रद्धालुओं को सलाह देते हुए कहा कि यदि किसी कारणवश वे पिशाचमोचन या गया जैसे तीर्थ स्थलों पर नहीं आ सकते, तो उन्हें अपने आस-पास के किसी मंदिर या शिवालय में जाकर ब्राह्मणों को दान देना चाहिए, भोजन कराना चाहिए और तर्पण करना चाहिए। उन्होंने कहा, "ऑनलाइन श्राद्ध से बचना चाहिए और पितरों की मुक्ति के लिए साक्षात ब्राह्मण भोजन कराना ही सबसे उत्तम है।" जब उनसे पूछा गया कि क्या कोई भक्त उनसे ऑनलाइन श्राद्ध की मांग को लेकर आया है, तो उन्होंने बताया कि जो भी भक्त ऐसी मांग लेकर आते हैं, वे उन्हें सीधे मना कर देते हैं। उन्होंने कहा, "श्राद्ध के लिए ऑनलाइन व्यवस्था न करें। यह हमारे सनातन धर्म का मजाक बनाना है। आज श्राद्ध ऑनलाइन हो रहा है, दर्शन ऑनलाइन हो रहे हैं, यह गलत है। इस परंपरा को रोकना जरूरी है।"
नई दिल्ली। पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए देशभर में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। महाराष्ट्र के नासिक और पंढरपुर को भी पितृकर्म के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। नासिक में गोदावरी नदी के तट और पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के किनारे श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त स्नान, तर्पण, पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।नासिक में बहने वाली गोदावरी को 'दक्षिण गंगा' के नाम से भी जाना जाता है। पितृपक्ष के दौरान गोदावरी के तट पर पितरों की संतुष्टि के लिए स्नान, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पितरों को शांति और तृप्ति मिलती है तथा परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। नासिक के पंचवटी क्षेत्र और गोदावरी तट स्थित रामकुंड को पितृ तर्पण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां श्रद्धालु स्नान करने के बाद अपने पितरों के नाम-गोत्र से तर्पण करते हैं और पिंडदान व श्राद्ध कर्म करते हैं। पितृपक्ष के दौरान इन स्थानों पर देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने की मान्यता है। नासिक के पास स्थित त्र्यंबकेश्वर को भी पितृकर्म के लिए विशेष महत्व दिया जाता है। यह क्षेत्र गोदावरी के उद्गम स्थल के रूप में धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां त्रिपिंडी श्राद्ध और नारायण नागबली जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाने की परंपरा है। मान्यता है कि त्रिपिंडी श्राद्ध और पिंडदान से अतृप्त पितरों को तृप्ति और मुक्ति मिलती है। कुशावर्त कुंड को भी पितृ तर्पण के महत्वपूर्ण स्थलों में माना गया है। पितृपक्ष में श्रद्धालु स्नान, तर्पण और श्राद्ध कर्म कर अपने पूर्वजों की शांति की कामना करते हैं। गोदावरी के तट पर पितृ कर्म के दौरान श्रद्धालु पितरों के नाम-गोत्र से तर्पण के साथ ब्राह्मण भोजन और दान भी करते हैं। इन कर्मों से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद मिलता है। इसी तरह, महाराष्ट्र का पंढरपुर भगवान श्री विट्ठल और माता रुक्मिणी के प्रसिद्ध धाम के रूप में जाना जाता है। यहां से होकर बहने वाली भीमा नदी अपने अर्धचंद्राकार प्रवाह के कारण 'चंद्रभागा' के नाम से भी जानी जाती है। चंद्रभागा नदी का तट पितृकर्म के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु चंद्रभागा नदी के घाट पर स्नान कर पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं। कहा जाता है कि यहां स्नान और विधि-विधान से किए गए पितृकर्म से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के बीच स्थित विष्णुपद मंदिर भी पितृकर्म से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। यहां भगवान विष्णु के चरणों के निशान होने की मान्यता है। यहां श्रद्धालु पितरों के मोक्ष और शांति की कामना से पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।