नई दिल्ली। उच्च शिक्षा के लिए छात्रों के जीवन संघर्ष की वास्तविक कहानियां आईआईटी मद्रास पूरे देश व दुनिया के सामने पेश करने जा रहा है। आईआईटी मद्रास की यह एक नई वृत्तचित्र फिल्म है जिसका नाम ‘पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस’ है। आईआईटी मद्रास ने इस फिल्म के लिए फिल्म निर्माण कंपनी इरॉस यूनिवर्स के साथ साझेदारी की है। फिल्म में संस्थान के छात्रों की ग्रेजुएशन से जुड़े सपनों, संघर्षों और उपलब्धियों को दिखाया गया है। देश के अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिवेश से आने वाले इन विद्यार्थियों की कहानियां बताती हैं कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच किस तरह लोगों के लिए नए अवसर खोल सकती है। इस फिल्म का निर्देशन और संपादन आईआईटी मद्रास के पूर्व विद्यार्थी शाश्वत मुखर्जी ने किया है। फिल्म की खास बात यह है कि इसकी शूटिंग केवल कक्षाओं या संस्थान परिसर तक सीमित नहीं रही। इसके लिए देशभर में विद्यार्थियों के घरों और उनके निजी परिवेश में पहुंचकर यह दिखाने की कोशिश की है कि वे किन परिस्थितियों में अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं। आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को गरीबों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

इसी सोच से प्रेरित होकर संस्थान ने ऐसे स्नातक उपाधि कार्यक्रम शुरू किए, जिनके माध्यम से विद्यार्थी परिसर में आए बिना भी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि इन कार्यक्रमों में नामांकित 25 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों से आते हैं। सामान्य संयुक्त प्रवेश परीक्षा यानी जेईई के रास्ते आईआईटी व्यवस्था तक पहुंचना जिन विद्यार्थियों के लिए संभव नहीं था, उनके लिए ये कार्यक्रम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने का अवसर बने हैं। प्रोफेसर कामकोटि के अनुसार, ‘पोर्ट्रेट ऑफ मेनी फेसेस’ एक भावनात्मक और विचारोत्तेजक फिल्म है। यह दिखाती है कि शिक्षा को अधिक सुलभ बनाकर स्वामी विवेकानंद के विचारों को व्यवहार में कैसे उतारा जा सकता है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि यह फिल्म दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचेगी और अन्य शैक्षणिक संस्थान भी ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित होंगे, ताकि सभी को समान, गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा मिल सके। आईआईटी मद्रास के कई स्नातक उपाधि कार्यक्रम विशेष रूप से चर्चा में है। संस्थान के अनुसार, इसमें 50 हजार से अधिक सक्रिय विद्यार्थी नामांकित हैं। इसे कैंपस के बाहर से संचालित होने वाला दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन उपाधि कार्यक्रम बताया गया है। इस कार्यक्रम की विशेषता यह है कि विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए आईआईटी मद्रास परिसर में रहना जरूरी नहीं है। वे अपने घर या अन्य स्थानों पर रहते हुए पढ़ाई कर सकते हैं और संस्थान के शिक्षकों से सीख सकते हैं।

इससे उन विद्यार्थियों को भी अवसर मिलता है, जो पारिवारिक जिम्मेदारियों, आर्थिक कठिनाइयों या भौगोलिक दूरी के कारण नियमित कैंपस आधारित शिक्षा हासिल नहीं कर पाते। फिल्म में शामिल 17 विद्यार्थियों की कहानियों के जरिए यह समझने का अवसर मिलता है कि अलग-अलग परिस्थितियों में रहने वाले लोग अपनी पढ़ाई कैसे जारी रखते हैं। इसमें उनके पारिवारिक परिवेश, चुनौतियों, महत्वाकांक्षाओं और शिक्षा से मिले नए अवसरों को सामने लाया गया है। फिल्म के निर्देशक शाश्वत मुखर्जी की कहानी भी इस कार्यक्रम की उपयोगिता को दर्शाती है। उन्होंने फिल्म निर्माण में अपना भविष्य बनाने की इच्छा के साथ आईआईटी मद्रास के स्नातक उपाधि कार्यक्रम में दाखिला लिया था।

कार्यक्रम की लचीली अध्ययन व्यवस्था ने उन्हें पढ़ाई के साथ अपनी रचनात्मक रुचियों को आगे बढ़ाने का अवसर दिया। उन्होंने एक फिल्म सोसायटी की स्थापना की और उसका नेतृत्व भी किया। इसके बाद उन्होंने दृश्य प्रभाव तकनीक, एआई और फिल्म निर्माण के मेल पर काम करने वाला एक नया उद्यम शुरू किया। इस तरह उनकी यात्रा भी फिल्म के मूल विचार को सामने रखती है कि शिक्षा और अपने सपनों को पूरा करने के बीच चुनाव करना हमेशा जरूरी नहीं होता। सही अवसर मिलने पर दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सकता है।