देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता और प्राचीन मंदिरों से हर किसी का मन मोह लेता है। ऐसे ही देहरादून का जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में यमुना नदी के किनारे स्थित लाखामंडल ऐसा ही एक अत्यंत प्राचीन और रहस्यमयी शिव मंदिर है, जो अपने पीछे पौराणिक कहानी समेटे हुए है। मंदिर के बारे में बताने से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी पीछे नहीं हटे।

उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर मंदिर का वीडियो जारी कर लिखा, "देहरादून के लाखामंडल में स्थित प्राचीन शिव मंदिर अनेकों श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। ऊंचे पहाड़ों और अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित यह मंदिर अपनी अद्वितीय वास्तुकला के लिए भी विशिष्ट पहचान रखता है। मान्यता है कि प्राचीन काल में इस पवित्र भूमि पर अनेक शिवलिंगों की स्थापना की गई थी। पवित्र श्रावण मास पर देवभूमि उत्तराखंड आगमन पर इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।"

बताया जाता है कि मंदिर महाभारत के इतिहास को महाभारत काल से जोड़ता है। कहते हैं कि पांडवों के अज्ञातवास काल में युधिष्ठिर ने लाखामंडल स्थित लाक्षेश्वर मंदिर के प्रांगण में जिस शिवलिंग की स्थापना की थी, वह आज भी विद्यमान है। इसी लिंग के सामने दो द्वारपालों की मूर्तियां हैं, जो पश्चिम की ओर मुंह करके खड़े हैं। इनमें से एक का हाथ कटा हुआ है। शिव को समर्पित लाक्षेश्वर मंदिर 12-13वीं सदी में निर्मित नागर शैली का मंदिर है।

इस मदिंर के अंदर आपको पार्वती जी के पैरों के निशान भी देखने को मिलते। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में अगर किसी शव को इन द्वारपालों के सामने रखकर मंदिर के पुजारी उस पर पवित्र जल छिड़कें तो वह मृत व्यक्ति कुछ समय के लिए फिर से जीवित हो उठता है। गंगाजल ग्रहण करते ही उसकी आत्मा फिर से शरीर त्यागकर चली जाती है लेकिन इस बात का रहस्य क्या है यह आज तक कोई नहीं जान पाया।

इस इलाके के आसपास पत्थर से बने सैकड़ों शिवलिंग मिलते हैं। साथ ही, यह भी बताया जाता है कि जल अर्पित करने के बाद शिवलिंग शीशे की तरह चमकने लगता है।

मान्यता है कि इसी जगह कौरवों ने पांडवों व उनकी माता कुंती को जीवित जलाने के लिए ही लाक्षागृह (लाख का घर) का निर्माण कराया था।बताया जाता हैं कि लाखामंडल में वह ऐतिहासिक गुफा आज भी मौजूद है, जिससे होकर पांडव सकुशल बाहर निकल आए थे। इसके बाद पांडवों ने 'चक्रनगरी' में एक माह बिताया, जिसे आज चकराता कहते हैं। लाखामंडल के अलावा हनोल, थैना व मैंद्रथ में खुदाई के दौरान मिले पौराणिक शिवलिंग व मूर्तियां इस बात की गवाह हैं कि इस क्षेत्र में पांडवों का वास रहा है।