नई दिल्ली। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी को और ज्यादा असरदार बनाने की दिशा में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक खोजी है, जिससे शरीर में मौजूद आंतों के बैक्टीरिया यानी गट माइक्रोबायोम में बदलाव कर कीमोथेरेपी की दवाओं को ट्यूमर तक अधिक मात्रा में पहुंचाया जा सकता है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है।दरअसल, आजकल कई तरह के कैंसर के इलाज में नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें दवा को बेहद छोटे कणों में पैक करके शरीर में भेजा जाता है, ताकि वह सीधे ट्यूमर तक पहुंच सके। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि दवा का बड़ा हिस्सा ट्यूमर तक पहुंचने से पहले ही लिवर साफ कर देता है। लिवर में मौजूद खास प्रतिरक्षा कोशिकाएं, जिन्हें कुप्फर सेल्स कहा जाता है, इन दवा कणों को खून से तेजी से हटाने लगती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि मरीज को दी गई दवा का पूरा फायदा नहीं मिल पाता।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इस पूरी प्रक्रिया में हमारी आंतों के बैक्टीरिया की भी बड़ी भूमिका होती है। ये बैक्टीरिया बाइल एसिड नामक रसायन बनाते हैं, जो लिवर की कोशिकाओं को संकेत भेजते हैं कि वे दवा को कितनी तेजी से साफ करें।
रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने मेट्रोनिडाजोल नाम की एक सामान्य एंटीबायोटिक का सीमित समय के लिए इस्तेमाल किया। इससे कुछ खास तरह के बैक्टीरिया कम हो गए और बाइल एसिड का स्तर भी घट गया। इसके बाद लिवर की कुप्फर कोशिकाएं कम सक्रिय हो गईं और उन्होंने दवा को पहले की तुलना में बहुत कम मात्रा में हटाया।
इसका फायदा यह हुआ कि कीमोथेरेपी की दवा शरीर में लगभग दोगुने समय तक बनी रही। इससे दवा ज्यादा मात्रा में ट्यूमर तक पहुंची, ट्यूमर की वृद्धि धीमी हुई और कई प्रकार के कैंसर के प्रीक्लिनिकल मॉडल में मरीजों के जीवित रहने की अवधि भी बढ़ी। यह असर कोलन, ब्रेस्ट, मेलानोमा और पैंक्रियाटिक कैंसर जैसे कई कैंसर मॉडलों में देखा गया।
वैज्ञानिकों ने यह भी जांचा कि यह असर एंटीबायोटिक की वजह से हुआ या वास्तव में गट माइक्रोबायोम की वजह से। इसके लिए उन्होंने फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट (एफएमटी) का प्रयोग किया। इसमें एंटीबायोटिक दिए गए मॉडल के आंतों के बैक्टीरिया दूसरे मॉडल में स्थानांतरित किए गए। खास बात यह रही कि दूसरे मॉडल में भी बिना एंटीबायोटिक दिए वही सकारात्मक परिणाम मिले। इससे साबित हुआ कि असली बदलाव माइक्रोबायोम की वजह से हुआ, न कि दवा के सीधे प्रभाव से।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज कैंसर के इलाज की सोच बदल सकती है। अब तक वैज्ञानिक केवल कीमोथेरेपी की दवा को बेहतर बनाने पर काम कर रहे थे, लेकिन यह अध्ययन बताता है कि मरीज के शरीर का माइक्रोबायोम भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
फिलहाल यह रिसर्च प्रीक्लिनिकल स्तर पर हुई है और इसे सीधे मरीजों पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, मेट्रोनिडाजोल पहले से मंजूर और सुरक्षित दवा है, इसलिए भविष्य में क्लिनिकल ट्रायल के जरिए यह देखा जा सकता है कि क्या कम अवधि के लिए इस एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नैनोपार्टिकल आधारित कीमोथेरेपी के साथ करने से मरीजों को बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में गट माइक्रोबायोम और बाइल एसिड की जांच यह पता लगाने में भी मदद कर सकती है कि कौन-से मरीज कीमोथेरेपी से सबसे ज्यादा लाभ उठा सकते हैं। यदि आगे के अध्ययन सफल रहते हैं, तो कैंसर का इलाज केवल दवा और ट्यूमर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मरीज के माइक्रोबायोम को ध्यान में रखकर भी उपचार की नई रणनीतियां तैयार की जा सकेंगी।




