मुंबई। छोटे पर्दे की अभिनेत्री देवोलीना भट्टाचार्जी ने करवा चौथ और इस त्योहार को मनाने वाले लोगों के बारे में अपनी राय साझा की है।गुरुवार को अभिनेत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबा नोट शेयर किया, जिसमें उन्होंने इस त्योहार को लेकर अपना नजरिया साझा किया।

उन्होंने लिखा, "आज करवा चौथ मना रही सभी खूबसूरत महिलाओं को शुभकामनाएं। मैंने कभी करवा चौथ का व्रत नहीं रखा है, क्योंकि बंगाली और असमिया संस्कृति में यह कोई परंपरा नहीं है। हो सकता है कि हमारे यहां हर तरह की रस्में न हों, लेकिन हम कई त्योहार पूरे दिल से मनाते हैं, तो फिर करवा चौथ क्यों नहीं? सच कहूं तो, मेरा भी कभी इसे रखने का मन करता है, लेकिन मुझे डर लगता है कि मैं पूरे दिन बिना पानी के कैसे रह पाऊंगी।

"मैं हर सोमवार और कभी-कभी एकादशी का व्रत रखती हूं, लेकिन बिना पानी के व्रत? यह तो बिल्कुल अलग बात है। असल मुद्दा यह नहीं है। मुझे सच में लगता है कि कई कपल के लिए यह प्यार जताने का एक तरीका है। मैंने महिलाओं को इसे खुशी-खुशी मनाते देखा है और आज तो कई पुरुष भी अपनी पत्नियों के साथ व्रत रखते हैं। फिर किसी और के जश्न में नारीवाद, पितृसत्ता और जजमेंट को क्यों लाना। अगर आप इसमें विश्वास नहीं करते, तो इसे मत मनाइए।"

उन्होंने आगे कहा कि कोई भी उन्हें जज नहीं कर रहा है, लेकिन किसी और की खुशी को खराब करना सही नहीं है।

उन्होंने लिखा, "मां अपने बच्चों और परिवार के लिए व्रत रखती हैं, तो अगर कोई महिला अपने पति के लिए व्रत रखना चाहे, तो उसमें क्या दिक्कत है? जब तक यह एक निजी फैसला है और किसी पर कोई दबाव नहीं है, तब तक लोगों को अपने तरीके से प्यार का जश्न मनाने देना चाहिए। एक निजी बात बताऊं, शान एक मुस्लिम परिवार से आते हैं, फिर भी हर करवा चौथ पर वे मुझसे पूछते हैं कि क्या तुम व्रत रखोगी और हर साल मैं थोड़े भारी मन से कहती हूं देखते हैं, अगले साल।"

उन्होंने कहा, "अभी मैं अपने बच्चे को स्तनपान करा रही हूं, इसलिए उम्मीद है कि अगले साल रखूंगी, क्योंकि सच कहूं तो, पतियों को भी तो प्यार महसूस करने का हक है, है न? हम खुद के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग करते हैं, कीटो डाइट ट्राई करते हैं और न जाने कितने तरह के डाइट प्लान फॉलो करते हैं, लेकिन जब पति के लिए व्रत रखने की बात आती है, तो अचानक सब कुछ पितृसत्ता और नारीवाद पर क्यों आ जाता है? महिलाओं, थोड़ा चिल करो। प्यार निजी होता है। परंपराएं निजी होती हैं। जश्न मनाना भी निजी होता है। लोगों को वह चुनने दें, जिससे उन्हें खुशी मिलती है।"