छतरपुर। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड की ऐतिहासिक पहचान केवल अभेद्य किलों, प्राचीन देवालयों, शौर्य गाथाओं और अनूठी लोक विरासत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां की सोंधी माटी में सदियों पुरानी जीवनशैली और लोकशिल्प भी गहराई से रचा-बसा है। पीढ़ियों से इस माटी को अपनी उंगलियों के हुनर से तराशकर जीवंत बनाए रखने का महती कार्य प्रजापति (कुम्हार) समाज करता आ रहा है। अपने पसीने से माटी को गूंथकर आस्था और परंपरा को मूर्त रूप देने वाला यह मेहनतकश समाज आज मशीनी दौर, चाइनीज उत्पादों के अंधाधुंध दखल और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते अपने अस्तित्व और आजीविका के गंभीर संकट से जूझ रहा है।



ढाई सौ वर्षों से माटी की सेवा में जुटा परिवार, रोजाना गढ़े जा रहे 3 हजार दीपक

छतरपुर शहर के गायत्री मंदिर के पीछे निवासरत प्रजापति समाज का एक वृहद परिवार पिछले 200 से 250 वर्षों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिट्टी के बर्तन, दीये और मूर्तियां गढ़ने के पुश्तैनी कार्य में जुटा है। करीब 40 से 50 सदस्यों का यह संयुक्त परिवार पूरी तरह माटी के चाक और भट्ठी पर ही आश्रित है। परिवार के सदस्य रोजाना 2500 से 3000 दीयों का निर्माण करते हैं, जो स्थानीय स्तर पर महज 1 से 3 रुपये में बिकते हैं। इस परिवार का मुख्य व्यवसाय चाय के लिए मिट्टी के कुल्हड़ तैयार करना है। कारीगर इन कुल्हड़ों को मात्र 3 रुपये में थोक व्यापारियों को सौंपते हैं, जबकि बाजार में वही कुल्हड़ 8 से 10 रुपये तक में बिकते हैं। बिचौलियों के मुनाफे के बीच असली शिल्पी का हिस्सा बेहद सीमित रह जाता है। हालांकि इनके हुनर की धमक केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के कई सीमावर्ती जिलों तक यहां के बने कुल्हड़, दीपक, मूर्तियां और पारंपरिक बर्तन बड़े पैमाने पर पहुंचते हैं।


कठिन साधना है माटी का शिल्प: महीनों पहले शुरू होता है गलन, छनन और पकाने का चक्र

दीपावली, करवा चौथ या नवरात्रि जैसे पर्वों के लिए कुम्हार परिवारों की तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों से विशेष चिकनी मिट्टी लाकर पहले उसे सुखाया जाता है, फिर कंकड़-पत्थर बीनकर उसे पानी में गलाया और बारीकी से छाना जाता है। इसके बाद मिट्टी को पैरों व हाथों से गूंधकर लोचदार बनाया जाता है। चाक पर सधे हाथों की कलाकारी के साथ-साथ पारंपरिक लकड़ी के औजार 'पाटों' से पीट-पीटकर बर्तनों को मनचाहा आकार दिया जाता है। आकार पाने के बाद इन कच्ची आकृतियों को धूप में सुखाया जाता है और फिर आंवा (भट्ठी) में लकड़ियों व उपलों की भीषण आंच पर पकाया जाता है। तब कहीं जाकर माटी का एक दीया, मटका, करवा, कोपर अथवा लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा बाजार में पहुंचने के लिए तैयार होती है।


इलेक्ट्रिक लड़ियों और चाइनीज बाजार ने छीनी आजीविका की चमक

भारतीय सनातन संस्कृति में मिट्टी के दीये का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व सर्वोपरि माना गया है। घर की देहरी पर मिट्टी के दीये की लौ केवल अंधकार ही नहीं मिटाती, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा, पवित्रता और पंचतत्वों के संतुलन का संदेश देती है। विडंबना यह है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में पारंपरिक मिट्टी के दीयों और कलाकृतियों का स्थान प्लास्टिक की चाइनीज लड़ियों, रेडीमेड मोमबत्तियों और सिंथेटिक सजावटी सामानों ने ले लिया है। इस मशीनी बाजार ने कुम्हारों की कमर तोड़ दी है। हाड़-तोड़ मेहनत, ईंधन की बढ़ती महंगाई और परिवहन लागत निकालने के बाद भी कारीगरों को अपनी कला का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है, जिससे युवा पीढ़ी इस पुश्तैनी कार्य से विमुख होने लगी है।


संरक्षण के लिए ठोस नीति, रियायती उपकरण और सुरक्षित विक्रय स्थल की आवश्यकता

बुंदेलखंड के लोकशिल्प और माटी के फनकारों को बचाने के लिए अब शासन-प्रशासन के स्तर पर ठोस और संवेदनशील पहल की नितांत आवश्यकता है। वर्तमान में कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी समस्या कच्चा माल तैयार करने, सुखाने और अपनी सामग्री बेचने के लिए बाजार में उचित जगह न मिलने की है। प्रशासन को प्रत्येक नगरीय निकाय और ग्राम पंचायत स्तर पर कुम्हार समाज के लिए 'माटी कला केंद्र' व निश्चित विक्रय स्थल आरक्षित करने चाहिए। साथ ही त्योहारों के समय विशेष 'माटी शिल्प बाजार' आयोजित कर बिचौलियों की भूमिका समाप्त की जानी चाहिए। कारीगरों को आधुनिक इलेक्ट्रिक चाक, वैज्ञानिक भट्ठियां (सोलर व गैस आधारित) और आसान वित्तीय सहायता उपलब्ध कराकर इस कला को नया जीवन दिया जा सकता है।


स्थानीय कारीगरों के स्वाभिमान को रोशन करने आगे आएं नागरिक

संस्कृति और लोककला का संरक्षण केवल सरकारी आदेशों से संभव नहीं है, इसके लिए आम जनमानस की सहभागिता सबसे महत्वपूर्ण है। आगामी त्योहारों पर जब हम अपने आशियानों को सजाएं, तो उन हाथों का भी ख्याल रखें जिनकी रोजी-रोटी हमारे एक दीये की खरीद पर टिकी है। यदि प्रत्येक नागरिक मिट्टी के दीये, मूर्तियां और कुल्हड़ खरीदने का संकल्प ले, तो इससे न केवल प्रदूषण से बचाव होगा बल्कि समाज के सबसे श्रमशील वर्ग के घर में भी खुशियों के दीप जल उठेंगे। मिट्टी का दीया जलाना केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने ही अंचल के श्रम, स्वाभिमान और विरासत को जीवित रखने का राष्ट्रीय दायित्व है।