तेल अवीव। इजरायल में नई सरकार किसकी होगी इसको लेकर तस्वीर अब भी साफ नहीं है। हाल ही संपन्न हुए चुनाव को लेकर राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है। अब रविवार को साफ होगा कि राष्ट्रपति इसाक हर्जोग किसे मौका देते हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी एवं पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट, दोनों ही बहुमत के आंकड़े से दूर हैं। ऐसे में हर्जोग के सामने चुनौती बड़ी है।
राष्ट्रपति हर्जोग रविवार को सरकार गठन के लिए किसी एक उम्मीदवार को आमंत्रित करने वाले हैं। उन्होंने एक वीडियो मैसेज जारी कर इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने कहा, "मैं आने वाले रविवार (8 नवंबर) को नेसेट (संसद) के एक सदस्य को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करूंगा।"
हालांकि, चुनाव बाद संसद में मिले समर्थन के आंकड़े आइजेनकोट के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उनकी राह भी आसान नहीं है। इसकी बड़ी वजह अरब पार्टियों का समर्थन है, जिसे आइजेनकोट सरकार में शामिल करने से इनकार कर चुके हैं।
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति के साथ राजनीतिक दलों के प्रमुखों की बातचीत गुरुवार को पूरी हुई। इस दौरान 120 सदस्यीय नेसेट (इजरायली संसद) के 67 सदस्यों ने आइजेनकोट के समर्थन में अपनी राय दी, जबकि नेतन्याहू को 46 सांसदों का समर्थन मिला।
नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक गठबंधन के पास 53 सीटें हैं। हालांकि, उनके पुराने सहयोगी यूनाइटेड टोरा यहूदी पार्टी ने समर्थन देने से परहेज किया है। यह पार्टी अति-रूढ़िवादी यहूदियों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने के मुद्दे पर सरकार से नाराज है।
हर्जोग ने अभी तक किसी भी पक्ष के समर्थन में स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। उनका कहना है कि आंकड़े भले ही एक तरफ झुकते दिखाई दे रहे हों, लेकिन दोनों खेमों के भीतर और उनके बीच मौजूद असहमतियों के कारण यह तय करना मुश्किल है कि कौन स्थिर गठबंधन बना पाएगा।
इजरायल में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का बहुमत जरूरी है। मौजूदा चुनावी स्थिति में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी और धार्मिक गठबंधन के पास 53 सीटें हैं, जबकि आइजेनकोट का समर्थन करने वाले चार यहूदी दलों के पास 48 सीटें हैं। अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के पास कुल 19 सीटें हैं।
आइजेनकोट को इन अरब दलों का समर्थन मिला है, जिससे उनके पक्ष में 67 सांसदों का आंकड़ा पहुंचता है। लेकिन उन्होंने इन पार्टियों को सरकार में शामिल करने से इनकार किया है। इन दलों में ज्वाइंट लिस्ट के 11 और यूनाइटेड अरब लिस्ट (राम) के आठ सांसद हैं।
राम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने आइजेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने की इच्छा जताई है। वहीं, ज्वाइंट लिस्ट ने सरकार में शामिल होने से इनकार करते हुए बाहर से समर्थन देने की पेशकश की।
आइजेनकोट ने इन दलों के समर्थन के बावजूद उनके साथ सरकार बनाने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। इनमें हमास को आतंकवादी संगठन के रूप में मान्यता देना भी शामिल है। अब्बास ने हमास को निरस्त्र करने का समर्थन किया है, लेकिन उसे आतंकवादी संगठन कहने से परहेज किया है।
इजरायली कानून के तहत किसी उम्मीदवार के लिए 61 सांसदों का प्रत्यक्ष समर्थन होना जरूरी नहीं है। वह इससे कम समर्थन के साथ भी सरकार बना सकता है, बशर्ते संसद में विश्वास मत हासिल कर ले। इस आधार पर आइजेनकोट अल्पमत सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं और बाद में अति-रूढ़िवादी दलों को अपने साथ जोड़ सकते हैं।
दूसरी ओर, नेतन्याहू के सामने भी बहुमत जुटाने की चुनौती है। उन्हें विपक्षी दलों में से किसी एक को अपने पाले में लाना होगा। एक विकल्प राष्ट्रीय एकता सरकार का भी है, जिसमें नेतन्याहू और आइजेनकोट के खेमे बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद संभाल सकते हैं। हालांकि, नेतन्याहू के कई विरोधी उनके नेतृत्व में सरकार में शामिल होने से इनकार कर चुके हैं।
अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के लिए इस चुनाव में नेतन्याहू को सत्ता में लौटने से रोकना प्रमुख मुद्दा रहा है। ज्वाइंट लिस्ट ने आइजेनकोट को समर्थन देने के अपने फैसले को जनता की उस मांग से जोड़ा है, जिसके तहत नेतन्याहू सरकार की वापसी रोकने की इच्छा जताई गई है।
इन पार्टियों ने बदले में इजरायल के अरब नागरिकों के लिए कुछ गारंटी मांगी हैं। इनमें घरों को गिराने की कार्रवाई रोकना, उनके खिलाफ भड़काऊ बयानों पर लगाम लगाना, समुदायों में बढ़ते अपराध पर कार्रवाई और फलस्तीनियों के राजनीतिक भविष्य को लेकर स्पष्ट दिशा तय करना शामिल है।
सरकार बनाने के लिए नामित उम्मीदवार को गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिन मिलेंगे। जरूरत पड़ने पर यह अवधि 14 दिन और बढ़ाई जा सकती है।
यदि पहला उम्मीदवार नाकाम रहता है तो दूसरे नेता को 28 दिन का मौका दिया जाएगा। उसके बाद भी सरकार नहीं बनती है तो संसद का बहुमत किसी तीसरे उम्मीदवार को मौका दे सकता है, जिसके पास 14 दिन होंगे।
तीसरा प्रयास भी विफल रहने पर नेसेट भंग हो सकती है और 90 दिनों के भीतर नए चुनाव कराने पड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रहेंगे।

















