दमोह, राजेन्द्र तिवारी। शहर के नूरी नगर इलाके में 3 अक्टूबर को गोवंश के अवशेष मिलने के बाद हिंदूवादी संगठनों का आक्रोश अब सड़कों पर उतर आया है। संगठनों ने पुलिस कार्रवाई के बाद भी प्रशासन के सामने सात बड़ी मांगें रख दी हैं। मांगें केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अवैध मीट दुकानों पर कार्रवाई, गौवंश को निशाना बनाने वालों पर एनएसए लगाने, गौचर भूमि से अतिक्रमण हटाने और गौमांस की सप्लाई से जुड़े होटल-प्रतिष्ठानों की जांच तक फैली हुई हैं।
संगठनों की सात प्रमुख मांगें
- आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई
- अवैध मीट दुकानों पर छापेमारी और कार्रवाई
- गौवंश को निशाना बनाने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) का प्रयोग
- गौचर भूमि से अतिक्रमण हटाना
- गौमांस की सप्लाई से जुड़े होटल और प्रतिष्ठानों की जांच
- गौहत्या और तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए विशेष अभियान
- जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना
कानून सख्त, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग क्यों?
सवाल बड़ा यही है कि अगर कानून सख्त है तो फिर गोहत्या और गौमांस की कथित तस्करी पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही? जब सरकार खुद गौ संरक्षण की बात करती है, तो जमीन पर तस्वीर इतनी अलग क्यों नजर आ रही है? यह सवाल सिर्फ एक घटना का नहीं है। दमोह में गोवंश की सुरक्षा और जिम्मेदार सरकारी तंत्र की जवाबदेही का भी है।
कांग्रेस का हमला, अमित शाह की मांग का जिक्र
इस घटना को कांग्रेस ने निंदनीय बताते हुए सरकार को घेरा है। दो दिन पहले ही केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह भोपाल दौरे पर थे। उन्होंने गाय और भैंसों की नस्ल सुधार के लिए मध्यप्रदेश सरकार से 50 एकड़ जमीन की मांग की थी। अब बड़ा सवाल यही है कि दमोह की घटना ने स्पष्ट कर दिया कि जब गौवंश ही नहीं रहेगा तो नस्ल सुधार कैसे होगा?
स्थानीय संगठनों का कहना है कि प्रशासन को अब सिर्फ कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। दमोह की इस घटना ने एक बार फिर गौ संरक्षण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को रेखांकित कर दिया है।











