इस्लामाबाद। पाकिस्तान के सिंध प्रांत का एक जिला गलत वजहों से चर्चा में है। जिले का नाम थारपारकर है और खुदकुशी दर में बढ़ोतरी इसकी पहचान हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जनवरी से सितंबर के बीच यहां122 लोगों ने आत्महत्या कर ली।1,778,407 की आबादी और सात तालुकों में फैले होने के बावजूद, थारपारकर में विशेष मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बहुत सीमित है। जिले के दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोगों को स्टाफ की कमी, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और जर्जर सड़कों के कारण चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता पाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
'द फ्राइडे टाइम्स' की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के स्वास्थ्य विभाग ने थारपारकर में लोगों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए दो प्रशिक्षित पेशेवरों को नियुक्त किया है।
बार-बार पड़ने वाले सूखे ने थारपारकर के लोगों की समस्याओं को और बढ़ा दिया है। थारपारकर के ग्रामीण इलाकों में अधिकांश परिवार अपनी आजीविका के लिए बारिश और पशुधन पर निर्भर हैं, जिससे वे पानी की कमी, जलवायु परिवर्तन, फसल खराब होने और पशुओं के नुकसान के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं।
सूखा पीड़ितों को अक्सर कृषि कार्यों और दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में संघार, मीरपुरखास और बदिन जिलों के सिंचित क्षेत्रों (बैराज क्षेत्रों) की ओर पलायन को मजबूर होना पड़ता है। इससे जिले में पारिवारिक जीवन और सामुदायिक संबंध बाधित होते हैं।
थारपारकर में पुरुष अक्सर काम की तलाश में अकेले पलायन कर जाते हैं। हालांकि, सूखे और अकाल जैसी स्थितियों के दौरान, पीने के पानी, भोजन और आजीविका के अवसरों की तलाश में कभी-कभी पूरे परिवार भी अपने गांव छोड़ देते हैं। इस तरह के विस्थापन से थारपारकर के लोगों के मन में मानसिक तनाव, असुरक्षा और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है।
'द फ्राइडे टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार, थारपारकर में बच्चे गरीबी और पलायन से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। बार-बार होने वाला विस्थापन उनकी पढ़ाई पर असर डालता है, और आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अक्सर स्कूल छोड़कर अपने परिवारों की मदद के लिए काम करना पड़ता है।
थारपारकर में महिलाओं को भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है; उन्हें पीने का पानी लाने और खाना पकाने के लिए ईंधन (लकड़ी) इकट्ठा करने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। साथ ही, उन्हें कपास की कटाई जैसे कृषि कार्यों के जरिए अपने परिवारों का भरण-पोषण भी करना पड़ता है। इन जिम्मेदारियों के अलावा, गरीबी के कारण स्वास्थ्य संकट भी पैदा होता है।
कुछ मामलों में, थारपारकर की महिलाओं को घरेलू हिंसा के कारण शारीरिक और मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है। अली नवाज रहीमू ने 'द फ्राइडे टाइम्स' की एक रिपोर्ट में कहा, "हालांकि आत्महत्या एक गंभीर समस्या है और इसे किसी एक कारण से नहीं जोड़ा जा सकता, लेकिन थारपारकर में लगातार गरीबी, बेरोजगारी, पारिवारिक कलह, सामाजिक दबाव, विस्थापन और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपर्याप्त मदद लोगों में मानसिक परेशानी का कारण बन सकते हैं। फिर भी, थारपारकर में आत्महत्या के मामलों में हुई बढ़ोतरी के पीछे के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए केवल अनुमान लगाने के बजाय, गहन शोध की आवश्यकता है। सही स्थिति को समझने के लिए थारपारकर के पिछले वर्षों के आंकड़ों से तुलना करना भी जरूरी है।"
रिपोर्ट के अनुसार, सिंध सरकार को थारपारकर में अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं (काउंसलरों) की नियुक्ति करके स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना चाहिए। सरकार को ऐसी जगहों पर 'मोबाइल मेंटल हेल्थ टीम' और रेफरल सेवाएं शुरू करनी चाहिए, जहां परिवहन की सुविधा कम है और लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित है। इसके अलावा, अधिकारियों को लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) को कम करने और मानसिक तनाव के शुरुआती लक्षणों को पहचानने में लोगों की मदद करने के लिए सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए।
















