नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी शिक्षण संस्थानों में रैगिंग और बुलिंग की समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय कानून बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

याचिकाकर्ता, जो खुद एक छात्र है, ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर मांग की थी कि देश के सभी स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में रैगिंग और बुलिंग को रोकने के लिए एक सख्त केंद्रीय कानून बनाया जाए।

याचिका में यह भी मांग की गई थी कि छात्रों की शिकायतों के रजिस्ट्रेशन और उन पर उचित कार्रवाई के लिए अनिवार्य दिशानिर्देश बनाए जाएं। साथ ही, बुलिंग और रैगिंग के दुष्प्रभावों और उससे बचाव के तरीकों को लेकर एक विशेष विषय शुरू किया जाए और उसे केंद्रीय और सभी राज्य शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह नियम सभी केंद्र और स्टेट एजुकेशन बोर्ड के अंतर्गत आने वाले संस्थानों में लागू होना चाहिए ताकि छोटे बच्चों को मानसिक प्रताड़ना से बचाया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान सुखदेव साहा मामले में पहले दिए गए निर्देशों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि रैगिंग को लेकर पहले ही व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं। ऐसे में एक नया केंद्रीय कानून बनाने के लिए कोर्ट सीधे तौर पर सरकार को आदेश नहीं दे सकता। यह मामला नीतिगत विषय है, जिस पर सरकार और संबंधित शिक्षा प्राधिकरणों को फैसला लेना है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की चिंता को पूरी तरह से खारिज नहीं किया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस पीआईएल को संबंधित अधिकारियों के समक्ष एक 'रिप्रेजेंटेशन' यानी अनुरोध पत्र के तौर पर भेजने की अनुमति दे दी है।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी मांगों को लेकर शिक्षा मंत्रालय और अन्य संबंधित अथॉरिटीज के पास जा सकता है, ताकि वे अपनी तरफ से जरूरी कार्रवाई कर सकें।