जबलपुर। जबलपुर पहुंचे ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और युवाओं के आंदोलन को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल पद से हटाने की मांग करते हुए चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की वकालत की। इसके साथ ही उन्होंने 'Gen Z' (नई पीढ़ी) के विरोध प्रदर्शनों को दबाने के बजाय सरकार को सहानुभूतिपूर्वक संवाद का रास्ता अपनाने की सलाह दी।
चुनाव आयोग की साख पर सवाल; मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग
शंकराचार्य ने निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हुए कहा: चुनाव प्रक्रिया को लेकर जनता और राजनीतिक हलकों में उठ रही शंकाएं लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक हैं। हालिया विवादों से चुनाव आयोग की साख और जनता के विश्वास को ठेस पहुंची है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत पद से हटाने की मांग करते हुए कहा कि भविष्य में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया ऐसी हो, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और पारदर्शिता पर आम जनता का भरोसा मजबूत हो सके।
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Gen Z की आवाज दबाने के बजाय सुने सरकार; 'चाणक्य' वाली राजनीति पर तंज
युवाओं द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों और आंदोलनों पर शंकराचार्य ने सरकार को सख्ती के बजाय संवेदनशीलता दिखाने की अपील की: उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी युवाओं की मांगों को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में न देखा जाए। जिस तरह बच्चा रोकर अपनी परेशानी बताता है, उसी तरह युवा भी अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं। खुद को राजनीति का बड़ा धुरंधर या 'चाणक्य' समझने वालों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि साफ दिल से अपनी बात रख रहे युवाओं से टकराव के बजाय उनकी बात सुनी जानी चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि यदि आंदोलन को कुचलने या लंबे समय तक लटकाने की कोशिश की गई, तो इसका असर देश की भावी राजनीति पर पड़ेगा और नई पीढ़ी के कई मजबूत नेता सड़कों से उभरकर सामने आएंगे।
छात्र राजनीति की बहाली की वकालत
विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए शंकराचार्य ने कहा: छात्र राजनीति के सक्रिय मंच बंद या कमजोर होने से नई पीढ़ी को राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व का व्यावहारिक अनुभव नहीं मिल पा रहा है। ऐसे माहौल में 'Gen Z' का यह आंदोलन युवाओं के लिए सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व क्षमता विकसित करने का नया माध्यम बन सकता है, जिसे दबाने के बजाय लोकतांत्रिक दायरे में समझना बेहद जरूरी है।











