बालाघाट, रितेश सोनी। मध्यप्रदेश के जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत संचालित छात्रावासों, आश्रम शालाओं और आवासीय विद्यालयों में पदस्थ अधीक्षकों के तबादले के ताजा आदेश ने प्रदेशभर की प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था में हलचल तेज कर दी है। 7 साल से अधिक समय से एक ही स्थान पर कार्यरत अधीक्षकों को हटाकर मूल शालाओं में भेजने के इस कदम को जहां विभाग प्रशासनिक कसावट बता रहा है, वहीं शिक्षक संगठन और अभिभावक इसे शैक्षणिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ मान रहे हैं।
सत्र के बीचों-बीच तबादले का समय बना विवाद की वजह
वर्तमान शैक्षणिक सत्र 2026-27 का आधा समय बीत चुका है और छात्रावासों में रहने वाले छात्र-छात्राओं की परीक्षाओं का दौर शुरू होने वाला है। आमतौर पर कर्मचारियों के नियमित स्थानांतरण मई और जून के ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान किए जाते हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई और शाला प्रबंधन प्रभावित न हो। ऐसे में अक्टूबर के महीने में बड़े पैमाने पर अधीक्षकों को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने से व्यवस्था चरमराने की आशंका जताई जा रही है।
विद्यार्थियों की सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव पर असर
छात्रावासों में अधीक्षक केवल एक प्रशासनिक पद नहीं होता, बल्कि दूर-दराज के जनजातीय क्षेत्रों से आने वाले बच्चों के लिए अभिभावक समान होता है। भोजन, स्वास्थ्य, दिनचर्या और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले अधीक्षकों के अचानक बदल जाने से छोटे बच्चों पर मानसिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। नए अधीक्षक को बच्चों की व्यक्तिगत समस्याओं, व्यवहार और परिसर के माहौल को समझने में महीनों का वक्त लग जाता है, जिससे व्यवस्था प्रभावित होती है।
नए अधीक्षकों की पदस्थापना में देरी से बढ़ सकती हैं दिक्कतें
आदेश के लागू होने के बाद यदि कार्यभार हस्तांतरण (हैंडओवर) और नए अधीक्षकों की नियुक्ति में जरा भी प्रशासनिक ढिलाई हुई, तो दूरस्थ क्षेत्रों के छात्रावास बिना मुखिया के हो जाएंगे। इससे छात्रों की सुरक्षा, भोजन की गुणवत्ता और दैनिक अनुशासन खतरे में पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि विभाग को नए अधीक्षकों को प्रभार सौंपने से पहले पुराने अभिलेखों, स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों और स्थानीय समस्याओं का पूरा ब्यौरा लिखित रूप में हस्तांतरित करने की सख्त व्यवस्था करनी चाहिए।
शिक्षकों के परिवारों और व्यावहारिक स्थितियों पर असर
इस फैसले से केवल विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि संबंधित शिक्षक और उनके परिवार भी प्रभावित हो रहे हैं। सत्र के बीच में अचानक स्थान परिवर्तन होने से शिक्षकों के अपने बच्चों की पढ़ाई, आवास और आवागमन की गंभीर समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। हालांकि प्रशासनिक नियमों का पालन अनिवार्य है, लेकिन व्यावहारिक कठिनाइयों को नजरअंदाज करने से कर्मचारियों का मनोबल गिरता है।
शासन से आदेश के क्रियान्वयन पर पुनर्विचार की मांग
छात्रावासों में शैक्षणिक माहौल, विद्यार्थियों की सुरक्षा और अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हुए विभिन्न वर्गों द्वारा शासन से इस निर्णय की समीक्षा करने की अपील की जा रही है। मांग की जा रही है कि यदि नियम के तहत अधीक्षकों को हटाना आवश्यक भी है, तो इसके क्रियान्वयन को चालू शैक्षणिक सत्र के समाप्त होने तक स्थगित रखा जाए या फिर चरणबद्ध तरीके से ऐसे समय लागू किया जाए जब परीक्षाओं पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।














