नई दिल्ली। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2025 में जहां चीन ने पाकिस्तान को दिए गए 2 अरब डॉलर के कर्ज की भुगतान अवधि बढ़ाई, वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने देश की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता मजबूत करने के लिए विस्तारित निधि सुविधा (ईएफएफ) और लचीलापन एवं स्थिरता सुविधा (आरएसएफ) के तहत 2.3 अरब डॉलर की नई वित्तीय सहायता दी। बैंकॉक स्थित पेज 3 न्यूज की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान पर बढ़ता कर्ज ऐसे समय में चिंता का विषय है, जब निम्न और मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) का बाहरी कर्ज भी तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2025 में इन देशों का कुल बाहरी कर्ज बढ़कर रिकॉर्ड 9.4 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में निम्न और मध्यम आय वाले देशों का बाहरी कर्ज 5.5 प्रतिशत बढ़ा। यह पिछले चार वर्षों में सबसे बड़ी सालाना वृद्धि है। इसके पीछे बॉन्ड जारी करने में बढ़ोतरी, अमेरिकी डॉलर की कमजोरी और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में निवेशकों का दोबारा भरोसा बढ़ना प्रमुख कारण रहे।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निजी पूंजी की वापसी की इन देशों को बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। विशेष रूप से दुनिया के सबसे गरीब देशों के लिए कर्ज लेना पिछले कई दशकों में सबसे महंगा हो गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज चुकाने की देनदारियां लगातार पांचवें वर्ष बढ़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय विकास संघ (आईडीए) से वित्तीय सहायता पाने के पात्र देशों का बाहरी कर्ज 8.1 प्रतिशत बढ़कर 1.3 लाख करोड़ डॉलर हो गया। वहीं, निम्न आय वाले देशों का बाहरी कर्ज 8.9 प्रतिशत बढ़कर 262.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह 2020 के बाद की सबसे बड़ी वृद्धि है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि निम्न और मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) के अनुपात में निजी क्षेत्र के कर्ज में 5.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। अर्थव्यवस्थाओं के बेहतर प्रदर्शन से कर्जदाताओं का इन बाजारों में भरोसा बढ़ा और उन्होंने दोबारा निवेश शुरू किया। इसके बावजूद कई सरकारें अपेक्षाकृत ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेती रहीं।
रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता यह जताई गई है कि जिन देशों की अतिरिक्त कर्ज का बोझ उठाने की क्षमता सबसे कम है, उन्हें ही सबसे अधिक ब्याज दरों पर कर्ज लेना पड़ रहा है। निजी वित्तपोषण पर बढ़ती निर्भरता ने आईडीए की सहायता के पात्र देशों के लिए कर्ज लेना और महंगा कर दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय ऋण बाजार में कर्ज देने की गतिविधियां दोबारा शुरू होने से विकासशील देशों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन बढ़ता कर्ज, महंगा निजी वित्तपोषण और भुगतान की बढ़ती देनदारियां उनकी दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के सामने गंभीर चुनौती बनी हुई हैं।

















