नई दिल्ली। सरकार ने ड्राफ्ट नेशनल स्टील पॉलिसी 2047 जारी की है, जिसमें भारत की कच्चे स्टील (क्रूड स्टील) उत्पादन क्षमता को मौजूदा लगभग 220 मिलियन टन से बढ़ाकर 2047 तक 604 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा गया है।नई नीति में स्टील क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने और बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए लौह अयस्क तथा कोकिंग कोल की उपलब्धता बढ़ाने का रोडमैप तैयार किया गया है। स्टील उत्पादन लागत में इन कच्चे माल की हिस्सेदारी 65 से 70 प्रतिशत तक होती है। भारत लौह अयस्क के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, लेकिन कोकिंग कोल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है।
ड्राफ्ट नीति के अनुसार, स्टील क्षेत्र में औसत कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को मौजूदा 2.54 टन कार्बन डाइऑक्साइड प्रति टन क्रूड स्टील से घटाकर 2047 तक 1.54 टन करने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य भारत के 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन के उद्देश्य के अनुरूप है।
नीति में अनुमान लगाया गया है कि 2047 तक फिनिश्ड स्टील की मांग बढ़कर 505 मिलियन टन हो जाएगी, जबकि प्रति व्यक्ति स्टील खपत बढ़कर 302 किलोग्राम तक पहुंच सकती है। उत्पादन क्षमता में वृद्धि से स्टील निर्यात में भी 45 मिलियन टन की बढ़ोतरी होने की संभावना है।
लौह अयस्क की मांग 2025 के 299 मिलियन टन से बढ़कर 2047 तक 772 मिलियन टन होने का अनुमान है। इसे देखते हुए सरकार ने विदेशी खदानों और संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क भंडार सुरक्षित करने के साथ घरेलू आपूर्ति और परिवहन अवसंरचना को मजबूत करने का प्रस्ताव रखा है।
नीति में स्लरी पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार करने पर भी जोर दिया गया है। इन पाइपलाइनों के माध्यम से लौह अयस्क को पानी के मिश्रण के रूप में परिवहन किया जाता है, जिससे सड़क और रेल परिवहन पर निर्भरता कम करने तथा लॉजिस्टिक्स दक्षता बढ़ाने में मदद मिलती है।
वहीं, कोकिंग कोल की मांग के 236 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। चूंकि भारत अपनी 92 प्रतिशत कोकिंग कोल जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है, इसलिए नीति में घरेलू खनन बढ़ाने, कोल वॉशरी का विस्तार करने, दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते करने और एआई की मदद से कोयले के बेहतर मिश्रण तैयार करने पर जोर दिया गया है।
मैंगनीज, चूना पत्थर और अन्य महत्वपूर्ण कच्चे माल की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भी विशेष रणनीति अपनाने का प्रस्ताव रखा गया है।
नीति में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने, स्क्रैप आधारित स्टील उत्पादन बढ़ाने, हाइड्रोजन आधारित तकनीकों को अपनाने और कार्बन कैप्चर तकनीक के इस्तेमाल का भी रोडमैप दिया गया है। इन उपायों को क्षमता विस्तार के साथ-साथ लागू करने पर जोर दिया गया है, ताकि उत्सर्जन लक्ष्य हासिल किए जा सकें।
ड्राफ्ट नीति में स्टेनलेस स्टील और स्पेशियलिटी स्टील जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि आयातित तकनीक और कच्चे माल पर निर्भरता कम की जा सके।
स्टील की गुणवत्ता सुधारने के लिए भारतीय मानकों और गुणवत्ता मूल्यांकन तंत्र को मजबूत बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया है। साथ ही डिजिटल परिवर्तन को भविष्य की प्राथमिकता बताया गया है।
इसमें डिजिटल अवसंरचना, साझा डेटा मानकों, इंडस्ट्री 4.0, विश्वसनीय एआई और स्वचालित उत्पादन प्रणालियों को बढ़ावा देने की योजना शामिल है।
सरकार का कहना है कि आने वाले वर्षों में कच्चे माल के स्रोतों में विविधता लाने, स्टील व्यापार बढ़ाने और तकनीकी सहयोग को मजबूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक और उपभोक्ता देश है। ड्राफ्ट नीति के अनुसार, भारत अन्य देशों के साथ सहयोग बढ़ाकर स्टील क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में काम करेगा।













