छतरपुर। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले अंतर्गत सटई नगर परिषद का एक बेहद चौंकाने वाला और विवादित मामला सामने आया है। यहां शासकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की जमीन पर बने डॉक्टरों के सरकारी आवास (क्वार्टर) को रात के अंधेरे में कथित तौर पर जेसीबी मशीन चलाकर जमींदोज कर दिया गया। हैरत की बात यह है कि एक शासकीय संपत्ति को ढहा दिए जाने की भनक न तो स्वास्थ्य विभाग के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (बीएमओ) को लगी और न ही नगर परिषद के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) को इसकी आधिकारिक जानकारी है। बिना किसी पूर्व सूचना, अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) या विधिवत आदेश के सरकारी भवन गिराए जाने को लेकर स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सटई अस्पताल परिसर में चिकित्सकों के निवास के लिए दो शासकीय क्वार्टर बने हुए थे। इनमें से एक क्वार्टर में डॉक्टर वर्तमान में सपरिवार निवास कर रहे हैं, जबकि दूसरे क्वार्टर में नए चिकित्सक के रहने की तैयारी चल रही थी। इसके लिए भवन में बाकायदा साफ-सफाई, बिजली की नई वायरिंग और पुताई का कार्य कराया जा रहा था। इसी बीच रात के समय अचानक पहुंची जेसीबी मशीन ने रेनोवेट हो रहे इस सरकारी आवास को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। सुबह जब स्वास्थ्य कर्मियों और स्थानीय नागरिकों ने मलबा देखा, तो अस्पताल परिसर में हड़कंप मच गया।
इस पूरे घटनाक्रम पर जब नगर परिषद सटई के सीएमओ रामस्वरूप अवस्थी से जानकारी चाही गई, तो उन्होंने हैरान करने वाला बयान देते हुए कहा कि भवन किसने और किसके आदेश पर गिराया, उन्हें इस बात की कोई अधिकृत जानकारी नहीं है। वहीं, स्थानीय सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि नगर परिषद अध्यक्ष के पति के कथित मौखिक निर्देशों पर रातों-रात इस मनमानी कार्रवाई को अंजाम दिया गया है। एक जिम्मेदार अधिकारी की अनभिज्ञता और जनप्रतिनिधि के परिजनों के दखल की चर्चाओं ने मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है।
स्वास्थ्य विभाग को नहीं दी गई कोई सूचना, बीएमओ भी बेखबर
सरकारी नियमों के मुताबिक, किसी भी शासकीय भवन को अनुपयोगी घोषित करने, गिराने या हस्तांतरित करने के लिए लोक निर्माण विभाग (PWD) की तकनीकी रिपोर्ट, मूल्यांकन और संबंधित विभाग की उच्चस्तरीय अनुमति अनिवार्य होती है। इस मामले में स्वास्थ्य विभाग और बीएमओ को किसी भी प्रकार की सूचना देना तक मुनासिब नहीं समझा गया। स्वास्थ्य विभाग की भूमि पर इस तरह रातों-रात की गई कार्रवाई से विभाग के अधिकारी भी असहज हैं और इसे सीधे तौर पर शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का कृत्य माना जा रहा है।













