देहरादून। उत्तराखंड के काशीपुर में स्थानीय कुम्हार पारंपरिक मिट्टी के दीयों की घटती बिक्री से जूझ रहे हैं। इसकी वजह से इलेक्ट्रिक और चीनी सजावटी लाइटों से मिल रही प्रतिस्पर्धा और उपयुक्त मिट्टी की कमी है। स्थानीय कुम्हार अनिता ने बताया कि वह दीपावली के लिए मिट्टी से दीयों को बनाने की तैयारी दो माह पहले से शुरू कर देती हैं। इस वर्ष भी मिट्टी के अलग-अलग दीये बनाए गए हैं। हालांकि, बारिश से काफी नुकसान हुआ है। बारिश की वजह से उपले भीग गए और मिट्टी के कच्चे बर्तन खराब हो गए, जिससे उन्हें काफी नुकसान हुआ है।

उन्होंने कहा कि मिट्टी के दीयों का दाम नहीं बढ़ रहा है। हर सामान के रेट में बढ़ती महंगाई के साथ ही बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन दीयों के दाम में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि मार्केट में चीनी सजावटी लाइटें आ गई हैं, जिस वजह से अब लोग दीये नहीं लेना चाहते हैं।

एक अन्य कुम्हार सोनू कुमार प्रजापति ने बताया कि दीपावली के लिए दीयों को बनाने की तैयारी 2 से 3 माह पूर्व से शुरू कर दी जाती है। इस दौरान सभी प्रकार के पारंपरिक दीयों का निर्माण किया जाता है। उन्होंने कहा कि प्रजापति समाज देश में इस पर्व के लिए एक अहम भूमिका निभाता है।

प्रजापति समाज इस पर्व में रोशनी फैलाने के लिए बहुत मेहनत करता है। हमारी सरकार से निवेदन है कि प्रजापति समाज को भूमि दी जाए और हमारे बारे में सोचा जाए। हमारे पास भूमि नहीं है। मिट्टी की बहुत दिक्कत रहती है। उन्होंने कहा कि प्रजापति समाज पिछड़े वर्गों में सबसे गरीब माना जाता है।

दीयों की कीमतों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि छोटे दीये 10 रुपए दर्जन के हिसाब से बिकते हैं। वहीं, बड़े और अन्य प्रकार के दीये 5 रुपए प्रति एक के हिसाब से बेची जाती है। कीमत सामान्य होने के बावजूद कई ग्राहक इसमें भी मोल-भाव करते हैं।