नई दिल्ली। कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में आमतौर पर कैमरा तस्वीर खींचने का काम करता है और मेमोरी उसे सहेजकर प्रोसेस करने का। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने इस पारंपरिक व्यवस्था को बदलकर एक ही बेहद पतले डिवाइस में देखने और याद रखने की क्षमता विकसित करने में सफलता हासिल की है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी और आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा प्रकाश-संवेदनशील (लाइट-सेंसिटिव) डिवाइस बनाया है, जो रोशनी हट जाने या बंद होने के बाद भी 'देखी गई' दृश्य सूचना को याद रख सकता है। यह मानव मस्तिष्क की तरह काम करने वाले आधुनिक एआई हार्डवेयर की दिशा में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जा रही है।
इस डिवाइस को मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से प्रेरित होकर "कृत्रिम सिनैप्स" (Artificial Synapse) के रूप में डिजाइन किया गया है। जिस तरह हमारी आंखें दृश्य देखकर मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को संदेश भेजती हैं और दिमाग उस तस्वीर को याद रखता है, ठीक उसी तरह यह डिवाइस प्रकाश के जरिए दृश्य सूचना को ग्रहण करता है, पहचानता है और प्रोसेस करता है। सबसे खास बात यह है कि प्रकाश स्रोत हटने के बावजूद यह सूचना को मिटने नहीं देता बल्कि सुरक्षित रखता है, जिससे इसे बार-बार बिजली देकर डेटा रीफ्रेश करने की जरूरत नहीं पड़ती।
लैब टेस्ट में 500 गुना कम बिजली और 90% सटीकता
प्रतिष्ठित शोध पत्रिका 'Carbon' में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, प्रयोगशाला परीक्षणों में इस डिवाइस ने पारंपरिक MXene-आधारित उपकरणों की तुलना में करीब 500 गुना कम ऊर्जा (बिजली) का उपयोग किया। इसके अलावा, व्यावहारिक परीक्षणों में इसने चेहरा पहचानने (Facial Recognition) में लगभग 90 प्रतिशत और सड़क यातायात के दृश्यों (Traffic Scenes) के विभिन्न हिस्सों को वर्गीकृत करने में करीब 85 प्रतिशत की उच्च सटीकता प्रदर्शित की। यह कम ऊर्जा में उच्च दक्षता का एक दुर्लभ उदाहरण है।
भविष्य के स्मार्ट उपकरणों पर क्या होगा असर?
पारंपरिक कैमरों और सेंसरों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वे भारी मात्रा में डेटा जनरेट करते हैं, जिसे प्रोसेस करने के लिए अलग प्रोसेसर और लगातार बिजली की जरूरत होती है। इस नए डिवाइस से 'इन-सेंसर कंप्यूटिंग' को बढ़ावा मिलेगा। इसका अर्थ यह है कि कैमरा सेंसर के स्तर पर ही जरूरी डेटा प्रोसेस हो सकेगा, जिससे स्मार्ट गैजेट्स, रोबोटिक्स, सेल्फ-ड्राइविंग कारों और निगरानी प्रणालियों में बिजली की खपत काफी कम की जा सकेगी। हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह 500 गुना ऊर्जा बचत प्रयोगशाला के खास डिवाइस तुलना पर आधारित है, न कि पूरे कमर्शियल एआई सिस्टम पर।
भारतीय शोधकर्ताओं का यह प्रयोग साबित करता है कि अगली पीढ़ी की एआई तकनीक सिर्फ बड़े सॉफ्टवेयर और डेटा सेंटरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हार्डवेयर के स्तर पर भी क्रांतिकारी बदलाव लाएगी। आईआईटी गुवाहाटी और खड़गपुर का यह संयुक्त शोध कम ऊर्जा में तेज गति से निर्णय लेने वाले ब्रेन-इंस्पायर्ड (न्यूरोमॉर्फिक) डिवाइसेज के निर्माण का रास्ता साफ कर रहा है। आने वाले समय में जब यह तकनीक प्रयोगशाला से निकलकर बड़े पैमाने पर उत्पादन में आएगी, तो यह एज-एआई (Edge AI) और पोर्टेबल स्मार्ट उपकरणों की दुनिया को पूरी तरह बदल सकती है।













