मुंबई। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर रोहित जैन ने गुरुवार को कहा कि देश में त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ कर्ज की मांग में तेजी देखने को मिल रही है और बैंकों को आने वाले महीनों में अपनी लिक्विडिटी का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना होगा। उन्होंने यह बात 13वें एसबीआई बैंकिंग एंड इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव में प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान कही।मीडिया से बात करते हुए रोहित जैन ने कहा कि देश में क्रेडिट ग्रोथ मजबूत बनी हुई है और आगामी महीनों में बैंकों के सामने बढ़ती ऋण मांग को पूरा करने के साथ-साथ पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखने की चुनौती रहेगी। उन्होंने बताया कि इस विषय पर आरबीआई ने बैंकों के साथ बैठक भी की है, जिसमें लिक्विडिटी प्रबंधन की रणनीतियों पर चर्चा की गई।

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर ने आगे कहा कि बैंकों के पास उपलब्ध धनराशि का उपयोग किस क्षेत्र में और किस प्रकार किया जाए, इसका फैसला प्रत्येक बैंक अपनी जरूरतों और कारोबारी परिस्थितियों के अनुसार करेगा।

उन्होंने कहा कि बैंकों की मौजूदा परियोजनाएं, ऋण प्रस्तावों की पाइपलाइन और भविष्य की लिक्विडिटी स्थिति को लेकर उनका आकलन इस बात को तय करेगा कि वे उपलब्ध फंड का उपयोग कैसे करते हैं। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह बैंकों का व्यावसायिक निर्णय होगा कि वे अपनी लिक्विडिटी को किस प्रकार तैनात करते हैं।

आरबीआई डिप्टी गवर्नर ने कहा कि बैंकों की एसेट-लायबिलिटी पोजीशन उनके फंड उपयोग के फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। बैंक यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि बढ़ती ऋण मांग को पूरा करने के साथ-साथ उनकी वित्तीय स्थिति संतुलित बनी रहे।

उन्होंने संकेत दिया कि त्योहारी सीजन के दौरान उपभोक्ता ऋण, वाहन ऋण, आवास ऋण और कारोबार से जुड़े ऋणों की मांग बढ़ने की संभावना रहती है, ऐसे में बैंकों को संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना होगा।

इससे पहले, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि भारतीय रुपया 31 मार्च, 2025 से 16 सितंबर, 2026 तक संचयी रूप से 13.1 प्रतिशत (पॉइंट-टू-पॉइंट आधार पर) कमजोर हुआ है। ऐसे में भारतीय मुद्रा के मौजूदा स्तर पर न केवल स्थिर रहने, बल्कि मजबूत होने की भी पर्याप्त गुंजाइश है।

उन्होंने कहा, "अगर कुछ कहा जाए तो ऐसा लगता है कि रुपए का मौजूदा स्तर न केवल स्थिर होने, बल्कि शायद मजबूत होने की भी पर्याप्त गुंजाइश रखता है। जब पूंजी प्रवाह से जुड़े उपाय पहली बार घोषित किए गए थे, तब बाजार विश्लेषकों ने भी इसी तरह की उम्मीद जताई थी।"

उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में चालू खाते का घाटा (सीएडी) और कम होना चाहिए। इसकी वजह अर्थव्यवस्था की पारंपरिक मजबूती के साथ-साथ नई ताकतों का उभरना है, जिसमें वस्तुओं के निर्यात में बढ़ती सफलता भी शामिल है।

गुप्ता ने मुंबई में एसबीआईडीएफसी के एक सम्मेलन में कहा, "आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित परिस्थितियां सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और उसके पास कई दशकों के सीएडी या भुगतान संतुलन (बीओपी) के शुद्ध घाटे को पूरा करने की क्षमता है।"

भारत परंपरागत रूप से चालू खाते में मामूली घाटा और पूंजी खाते में बड़ा अधिशेष दर्ज करता रहा है, जिसके परिणामस्वरूप भुगतान संतुलन (बीओपी) सकारात्मक रहा है।