छतरपुर/हरपालपुर, शिवम सोनी। बुंदेलखंड के छतरपुर जिले के हरपालपुर नगर में सैकड़ों फीट ऊंचे पहाड़ पर स्थित मां अर्द्धकुंवारी का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। लोकमान्यता के अनुसार, सैकड़ों वर्ष पहले दुर्गा मां की एक अनन्य साधक कन्या हल्दी लगाए पहाड़ पर पहुंची थी, जहां पहाड़ में दरार हुई और वह उसमें समा गई। मान्यता है कि उसी स्थान पर माता की सूक्ष्म पिंडी प्रकट हुई, जिसके बाद से यहां मां अर्द्धकुंवारी की पूजा-अर्चना की जाने लगी।


जिला मुख्यालय छतरपुर से करीब 55 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 300 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर में सुबह चार बजे माता की आरती होती है, जबकि नवरात्र की अष्टमी पर विशेष रूप से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। भक्त दूर-दराज से पहुंचकर माता के दरबार में अपनी मनोकामनाओं की अर्जी लगाते हैं। श्रद्धालुओं की आस्था है कि मां अर्द्धकुंवारी के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।

दो बारातों के विवाद से जुड़ी है लोककथा

स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार, एक निर्धन परिवार की कन्या दुर्गा मां की कठोर साधक थी। लोककथा के मुताबिक, संयोगवश एक ही दिन दो बारातें उससे विवाह करने पहुंच गईं, जिससे विवाद की स्थिति बन गई। घबराई कन्या शरीर पर हल्दी लगाए पहाड़ पर पहुंची और देवी मां का स्मरण करने लगी। मान्यता है कि इसी दौरान पहाड़ में दरार हुई और कन्या उसमें समा गई। जब लोग उसे खोजते हुए वहां पहुंचे, तो उन्हें हल्दी के निशानों के बीच एक सूक्ष्म पिंडी दिखाई दी। तभी से इस स्थान पर मां अर्द्धकुंवारी की पूजा होने की मान्यता प्रचलित है।

नवरात्र की अष्टमी पर उमड़ते हैं हजारों श्रद्धालु

समय के साथ श्रद्धालुओं के सहयोग से पहाड़ पर मंदिर का निर्माण हुआ और दर्शन के लिए सीढ़ियां बनाई गईं। पहाड़ की ऊंचाई को देखते हुए सीढ़ियों के किनारे सुरक्षा के लिए रेलिंग भी लगाई गई है। श्रद्धालुओं के लिए पेयजल की व्यवस्था हेतु पहाड़ पर पानी की टंकी बनाई गई है। नवरात्र के दौरान सुबह से ही भक्तों का पहुंचना शुरू हो जाता है। विशेषकर अष्टमी की रात माता के दरबार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। पहाड़ की ऊंचाई से दिखाई देने वाला प्राकृतिक दृश्य भी भक्तों और दर्शनार्थियों को आकर्षित करता है। मां अर्द्धकुंवारी का यह धाम धार्मिक आस्था, लोककथा और बुंदेलखंड की सांस्कृतिक परंपरा का अनूठा प्रतीक माना जाता है।