टीकमगढ़, मोहसिन अहमद। नगर पालिका परिषद टीकमगढ़ में सामने आई कथित वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर तूल पकड़ता जा रहा है। जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष अब्दुल गफ्फार मलिक को पद से हटाकर पांच वर्ष के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किए जाने के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि उसी जांच में दोषी पाए गए अधिकारियों और कर्मचारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पार्षदों ने भी कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर दोषियों के खिलाफ समान कार्रवाई की मांग की है।
मामले की गूंज अब विधानसभा तक पहुंच गई है। टीकमगढ़ विधायक यादवेंद्र सिंह ने नियम 138(1) के तहत विधानसभा अध्यक्ष को सूचना देकर नगरीय विकास एवं आवास मंत्री का ध्यान आकर्षित कराया है। उन्होंने कहा कि 23 जनवरी 2026 को तीन सदस्यीय जांच दल की रिपोर्ट में तत्कालीन अध्यक्ष सहित 15 अधिकारियों एवं कर्मचारियों को विभिन्न वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार माना गया था। इसके बावजूद शासन ने केवल निर्वाचित अध्यक्ष पर कार्रवाई की, जबकि अन्य जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी अब भी अपने पदों पर कार्यरत हैं। इसे भेदभावपूर्ण कार्रवाई बताया गया है।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष नवीन साहू ने कलेक्टर को दिए ज्ञापन में जांच में दोषी पाए गए अधिकारियों और कर्मचारियों को तत्काल निलंबित कर विभागीय एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि जनप्रतिनिधि पर कार्रवाई की जा सकती है तो शासन के स्थायी प्रतिनिधि रहे अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी समान रूप से कार्रवाई होना न्यायोचित है। ज्ञापन की प्रति नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के आयुक्त को भी भेजी गई है।
इस पूरे प्रकरण में भाजपा पार्षदों का कांग्रेस के साथ खड़ा होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कार्रवाई की मांग करने वालों में जिला कांग्रेस अध्यक्ष नवीन साहू, नगर पालिका उपाध्यक्ष सुषमा-संजय नायक, कांग्रेस पार्षद अनीस अहमद, नफीसा फरीद खान, पूनम जायसवाल, ऊषा-सुरेंद्र सोनी, देवीदयाल अहिरवार के अलावा भाजपा पार्षद राखी-ध्रुव यादव, रामकुमार यादव, अरविंद्र रजक तथा निर्दलीय पार्षद अंशुल जैन भी शामिल हैं। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर व्यापक असंतोष है।
जांच रिपोर्ट में आरक्षित दुकानों के नियम विरुद्ध आवंटन, प्रतिबंध के बावजूद दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की नियुक्ति, डूब क्षेत्र में क्लीनिक निर्माण, पाइप लाइन सामग्री की महंगी खरीद, एलईडी लाइट और पाइप खरीद में कथित वित्तीय अनियमितताएं, टेंडर प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी तथा लाखों रुपये की आर्थिक क्षति जैसे गंभीर आरोप दर्ज किए गए हैं। रिपोर्ट में इन फैसलों को नगर पालिका की आर्थिक स्थिति और नागरिक सुविधाओं के लिए नुकसानदायक बताया गया है।
अब मुख्यमंत्री के संभावित दौरे और विधानसभा में मुद्दा उठने के बाद प्रशासन की अगली कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार जांच रिपोर्ट में जिम्मेदार बताए गए अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी कार्रवाई करती है या मामला केवल निर्वाचित प्रतिनिधि तक ही सीमित रहता है।




