नई दिल्ली। आगामी 2 से 4 नवंबर तक वाराणसी में आयोजित होने वाले 'वर्ल्ड सिम्पोजियम ऑन एंशिएंट विजडम फॉर मॉडर्न चैलेंजेज' में दुनिया भर के लगभग 200 विद्वान, दार्शनिक, शिक्षाविद, नीति विशेषज्ञ और विचारक हिस्सा लेंगे। तीन दिवसीय इस सम्मेलन में हिंदू, बौद्ध और जैन दर्शन जैसी प्राचीन परंपराओं के माध्यम से आधुनिक वैश्विक चुनौतियों के समाधान पर चर्चा की जाएगी। सम्मेलन का केंद्रीय विषय 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना के अनुरूप शांति, सतत विकास, सुशासन और मानव कल्याण को बढ़ावा देना होगा।इस बीच, रविवार को संयुक्त राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क (एसडीएसएन) के अध्यक्ष जेफ्री सैक्स ने मीडिया से बातचीत में कहा कि दुनिया इस समय अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर संघर्ष, अस्थिरता और विभाजन बढ़ने के बजाय समाज के सभी वर्गों को शांति, सहयोग और साझा भविष्य की दिशा में काम करने की आवश्यकता है।

सैक्स ने आगे कहा, "समृद्धि, सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय स्थिरता और विश्व शांति जैसे साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए देशों और समाजों को एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा।" उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मेलन केवल अकादमिक चर्चा का मंच नहीं होते, बल्कि दार्शनिकों, उद्योग जगत, नीति निर्माताओं, राजनीतिक नेताओं और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े प्रतिनिधियों के बीच संवाद स्थापित कर व्यावहारिक समाधानों की दिशा भी तय करते हैं।

वहीं, नीदरलैंड की यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर कियारा रोब्बियानो ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य विभिन्न संस्कृतियों और विचारधाराओं के बीच संवाद को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं है कि सभी किसी एक निष्कर्ष पर सहमत हों, लेकिन एक साझा संवाद और समझ विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।

रोब्बियानो ने कहा, "प्राचीन ज्ञान परंपराएं आज के जटिल सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रश्नों को देखने के लिए नए दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। आधुनिक अवसरों और चुनौतियों को समझने के लिए केवल तकनीकी समाधानों पर नहीं, बल्कि दार्शनिक सोच और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी ध्यान देना होगा।"

इसके साथ ही, रोम टोर वर्गाटा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिकार्डो पॉज्जो ने मीडिया से कहा कि बीते वर्षों में एथेंस, बीजिंग और रोम में आयोजित विश्व दार्शनिक सम्मेलनों ने विभिन्न सभ्यताओं और विचार परंपराओं के बीच संवाद को मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि अरस्तू, कन्फ्यूशियस, बुद्ध और इस्लामी चिंतन जैसी परंपराओं को जोड़ने का प्रयास इन वैश्विक मंचों पर हुआ है।

उन्होंने कहा कि दर्शनशास्त्र से शुरू हुआ संवाद अब नागरिक समाज, राजनीति और भू-राजनीति तक पहुंच चुका है और भविष्य में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण होगी।

वहीं, इथियोपिया के अदीस अबाबा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वर्किनेह केलबेसा ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि लंबे समय तक अफ्रीकी और अन्य पारंपरिक समाजों के स्थानीय ज्ञान को कमतर आंका गया, लेकिन शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि इनमें पर्यावरण संरक्षण और सतत जीवनशैली से जुड़ी महत्वपूर्ण सीख मौजूद है।

उन्होंने कहा कि अफ्रीका के कई समुदायों और इथियोपिया के जातीय समूहों पर किए गए अध्ययन बताते हैं कि पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में उपयोगी साबित हो सकता है। उन्होंने बताया कि स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन बनाना भविष्य की बड़ी आवश्यकता होगी।

सम्मेलन के दौरान प्रतिभागी वाराणसी और सारनाथ के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों का भी दौरा करेंगे। आयोजकों का मानना है कि यह सम्मेलन वैश्विक स्तर पर शांति, सांस्कृतिक संवाद और सतत विकास के लिए नए विचारों और साझेदारियों को बढ़ावा देगा।