छतरपुर, सुबोध त्रिपाठी/विनोद मिश्रा। आज सुबह की शुरुआत आम दिनों जैसी बिल्कुल नहीं थी। छतरपुर जिले के किशनगढ़ से गुजरने वाली बराना नदी, जो पिछले 16 दिनों से एक बेहद अनोखे और संवेदनशील आंदोलन की गवाह बनी हुई थी, वहाँ आज तड़के एक ऐसा घटनाक्रम घटा जिसने पूरे इलाके में हलचल मचा दी। अब दोपहर ढलने को है, नदी का किनारा शांत है, लेकिन हवा में सुबह के उस हंगामे की तपिश अब भी महसूस की जा सकती है।

कहानी की शुरुआत होती है आज सुबह के उस वक्त से, जब आसमान में भोर की पहली किरण भी ठीक से नहीं फूटी थी। पूरा किशनगढ़ गहरी नींद में सोया हुआ था। लेकिन बराना नदी के पानी के बीचों-बीच, लकड़ियों की एक सांकेतिक चिता पर कुछ लोग जाग रहे थे। ये थे अमित भटनागर और उनके साथी, जो केन-बेतवा लिंक परियोजना में हुए कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ पिछले दो हफ्तों से अपनी जान जोखिम में डालकर प्रदर्शन कर रहे थे। तभी, सन्नाटे को चीरती हुई पुलिस की गाड़ियों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। जिला प्रशासन और पुलिस बल ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत चुपके से पूरे नदी क्षेत्र को चारों तरफ से घेर लिया।


तड़के का वह चक्रव्यूह और एक्शन

जैसे ही पुलिस के भारी बूट्स पानी में उतरे, नदी की लहरों के साथ-साथ वहाँ मौजूद आंदोलनकारियों की सांसें भी तेज हो गईं। किसी भी अप्रिय स्थिति या कानून-व्यवस्था को बिगड़ने से रोकने के लिए पुलिस ने चक्रव्यूह तैयार कर रखा था।

नदी के भीतर डटे प्रदर्शनकारियों ने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन भारी पुलिस बल के आगे उनकी एक न चली। पुलिस ने बलपूर्वक कार्रवाई करते हुए सभी आंदोलनकारियों को पानी के बीच से हटा दिया। देखते ही देखते, 16 दिनों से चल रहा वह अनोखा प्रदर्शन कुछ ही मिनटों में समाप्त करा दिया गया।

कहानी में मोड़: इस कार्रवाई का सबसे बड़ा मकसद सिर्फ आंदोलन खत्म कराना नहीं था। पुलिस के रिकॉर्ड में अमित भटनागर एक लंबे समय से फरार चल रहे आरोपी थे, जिन पर हत्या के प्रयास (अटेम्प्ट टू मर्डर) और शासकीय कार्य में बाधा डालने जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज थे। पुलिस ने मौके का फायदा उठाते हुए अमित भटनागर और उनके कुछ प्रमुख साथियों को तुरंत अपनी हिरासत में ले लिया।


दोपहर का सन्नाटा और सुलगते सवाल

सुबह की उस अफरा-तफरी के बाद, अमित भटनागर को कड़े सुरक्षा घेरे में मेडिकल चेकअप के लिए नजदीकी सरकारी अस्पताल भेजा गया और उनके खिलाफ कानूनी विधिक प्रक्रिया शुरू कर दी गई।

अब जब दोपहर हो चुकी है, बराना नदी के उस घाट पर सन्नाटा पसरा है जहाँ सुबह तक नारेबाजी हो रही थी। लेकिन इस सन्नाटे के पीछे दो अलग-अलग दलीलें तैर रही हैं:

  • प्रशासन का कहना है कि यह कदम पूरी तरह से न्यायसंगत था। शांति व्यवस्था बनाए रखने और एक कानूनन फरार आरोपी को पकड़ने के लिए यह कार्रवाई जरूरी थी।
  • वहीं दूसरी तरफ, समर्थकों का आरोप है कि यह लोकतंत्र की आवाज को दबाने की कोशिश है। केन-बेतवा जैसी महापरियोजना में हुए करोड़ों के कथित भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच की मांग को दबाने के लिए प्रशासन ने यह दमनकारी रास्ता चुना।

सूरज अब सिर पर आ चुका है। किशनगढ़ और बराना नदी के आसपास के संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात है। अधिकारी मुस्तैद हैं और स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। नदी से वह सांकेतिक चिता तो हटा दी गई है, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों की जो आग आज सुबह बुझाई गई, उसकी राजनीतिक तपिश इस दोपहर बुंदेलखंड की हवाओं में साफ महसूस की जा सकती है।


छतरपुर कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने सामने रखा प्रशासन का पक्ष

इस पूरे मामले पर छतरपुर कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने प्रशासन का रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह कार्रवाई किसी आंदोलन को दबाने के लिए नहीं, बल्कि प्रदर्शनकारियों की जान-माल की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए की गई है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ दिनों से क्षेत्र में भारी बारिश के कारण बराना नदी का जलस्तर काफी बढ़ गया था, जिससे जलभराव की स्थिति में नदी के बीचों-बीच बैठे लोगों की जान को गंभीर खतरा हो सकता था।

कलेक्टर पार्थ जैसवाल के मुताबिक, प्रभावित ग्रामीणों की मुख्य मांग विस्थापन पैकेज को 5 लाख से बढ़ाकर 12.50 लाख रुपये करने की थी, जिसे मध्य प्रदेश सरकार की कैबिनेट पहले ही मंजूरी दे चुकी है और इसकी जानकारी भी प्रदर्शनकारियों को बार-बार दी गई थी। बिना किसी प्रशासनिक अनुमति या लिखित सूचना के किए जा रहे इस आंदोलन स्थल से सभी पन्ना जिले के निवासियों को सकुशल बसों के माध्यम से उनके गृह ग्राम भेज दिया गया है। वहीं, आंदोलनकारियों द्वारा लगाए गए 400 करोड़ रुपये के कथित घोटाले के आरोपों पर कलेक्टर ने साफ किया कि जिला प्रशासन को इस संबंध में अब तक कोई लिखित शिकायत या सबूत प्राप्त नहीं हुए हैं, लेकिन यदि ऐसी कोई शिकायत मिलती है, तो निश्चित तौर पर उसकी निष्पक्ष जांच कराई जाएगी।