छतरपुर। केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना से विस्थापित ग्रामीणों के पुनर्वास की स्थिति का जायजा लेने छतरपुर पहुंचे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के तीन सदस्यीय जांच दल ने पुनर्वास स्थल करोंदिया में बदहाल व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जांच दल ने आरोप लगाया कि ग्रामीणों को बेहतर जीवन देने के बजाय ऐसी परिस्थितियों में रहने को मजबूर किया जा रहा है, जिन्हें देखकर इसे पुनर्वास नहीं, नर्कवास कहना अधिक उचित होगा।
सीपीआई की राष्ट्रीय सचिव एनी राजा, भारतीय महिला फेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव निशा सिद्धू और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी शामिल जांच दल ने 23 और 24 अगस्त को छतरपुर जिले के पुनर्वास स्थल करोंदिया का दौरा किया। यहां डूब क्षेत्र में आने वाले ढोंढर गांव के विस्थापित ग्रामीणों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं जानी गईं। दल ने परियोजना स्थल का निरीक्षण करने के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ताओं और परियोजना निर्माण कंपनी के अधिकारियों से भी चर्चा की। बाद में जांच दल ने छतरपुर कलेक्टर मृणाल मीणा से मुलाकात कर समस्याओं और अपनी मांगों से अवगत कराया।
150 से अधिक लोगों को अब तक प्लॉट नहीं
जांच दल के मुताबिक पुनर्वास के लिए पात्रता सूची में कई विसंगतियां सामने आई हैं। प्रत्येक परिवार को 20म50 वर्गफीट का प्लॉट दिया गया है, जबकि ग्रामीणों के अनुसार ये प्लॉट उनके पुराने घरों की तुलना में काफी छोटे हैं। पुनर्वास पैकेज के तहत प्रत्येक वयस्क यूनिट को मकान निर्माण के लिए साढ़े 12 लाख रुपये दिए गए हैं।
दल का दावा है कि दौरे के दौरान पुनर्वास स्थल पर एक पटवारी पात्र लोगों के नाम सूची में जोडऩे का काम कर रहा था। ग्रामीणों के अनुसार कागजी दस्तावेजों के अभाव में अब भी 150 से अधिक वयस्क ऐसे हैं, जिन्हें घर बनाने के लिए प्लॉट नहीं मिल पाया है।
बारिश में डूबा पुनर्वास स्थल
जांच दल ने पुनर्वास स्थल की भौतिक स्थिति पर भी सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार प्लॉट सड़क की ऊंचाई से करीब चार से पांच फीट नीचे हैं। बारिश के बाद पूरी बस्ती में पानी भर गया था। घरों तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों ने पानी के बीच पत्थर डालकर अस्थायी रास्ते बनाए थे।
कई परिवारों के मकान अभी निर्माणाधीन हैं। ऐसे में ग्रामीण ईंटों से बनी अस्थायी कोठरियों में रहने को मजबूर हैं। इन्हीं जगहों पर उनका घरेलू सामान और सालभर का अनाज भी रखा था। बारिश के कारण अनाज भीग गया और खराब होने की स्थिति में पहुंच गया। जांच दल के दौरे के समय ग्रामीण अनाज को सुखाने के लिए बाहर फैला रहे थे, लेकिन लगातार बारिश के कारण उन्हें राहत नहीं मिल पा रही थी।
न स्कूल, न आंगनवाड़ी, न शौचालय
जांच दल ने आरोप लगाया कि ग्रामीणों को विस्थापित करने के दौरान पुलिस और प्रशासन ने सख्ती दिखाई, लेकिन पुनर्वास स्थल पर मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था नहीं की गई। रिपोर्ट के अनुसार बस्ती में दो हैंडपंप लगाए गए थे, जिनमें से एक खराब था। शौचालय, स्कूल, आंगनवाड़ी और पर्याप्त सड़क जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं।
दल के अनुसार बस्ती में गर्भवती महिलाओं की स्थिति भी चिंताजनक है। जानकारी लेने पर करीब चार-पांच गर्भवती महिलाओं के बारे में पता चला, लेकिन प्रसव के समय तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए न पर्याप्त स्वास्थ्य व्यवस्था है और न ही दाई जैसी सुविधा।
आंदोलनकारियों पर मुकदमों का आरोप
जांच दल ने यह भी आरोप लगाया कि पुनर्वास और विस्थापन के खिलाफ आंदोलन कर रहे ग्रामीणों को पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा। सत्याग्रह समाप्त कराने के दौरान पुलिस का विरोध करने वाले कई ग्रामीणों और आंदोलनकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाने की बात भी जांच दल के सामने आई।
46 लाख पेड़ों के डूबने का दावा
जांच दल ने केन-बेतवा परियोजना के निर्माणाधीन हिस्से का भी निरीक्षण किया। परियोजना निर्माण कंपनी के अधिकारियों ने बताया कि उनकी जिम्मेदारी केन नदी पर बांध निर्माण और दो सुरंगों के निर्माण की है। इसके बाद केन के पानी को नहरों के माध्यम से बेतवा नदी से जोडऩे की योजना है।
परियोजना के समर्थकों के अनुसार इससे मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बड़े क्षेत्र में सिंचाई तथा लाखों लोगों को पेयजल उपलब्ध होगा। वहीं क्षेत्र के आंदोलनकारी अमित भटनागर ने जांच दल को बताया कि परियोजना के कारण करीब 46 लाख पेड़ों के डूबने की आशंका है। उनका दावा है कि टाइगर रिजर्व का कोर क्षेत्र और आगे घडिय़ाल अभयारण्य भी प्रभावित होगा।
जांच दल ने सवाल उठाया कि यदि परियोजना वास्तव में लोगों के हित में है तो प्रभावित 21 गांवों के ग्रामीणों को नियमानुसार और सम्मानजनक पुनर्वास क्यों नहीं दिया जा रहा है।
पुनर्वास स्थल पर नशे की समस्या का भी आरोप
जांच दल के अनुसार पुनर्वास स्थल पर रोजगार के अभाव में ग्रामीणों के बीच नशे की समस्या भी दिखाई दी। दल ने कुछ लोगों को दिन में शराब पीते हुए देखने का दावा किया। ग्रामीणों से बातचीत में कथित तौर पर अवैध शराब की उपलब्धता और पुलिस की मिलीभगत के आरोप भी सामने आए।
कलेक्टर से तत्काल सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग
24 अगस्त की सुबह जांच दल ने छतरपुर कलेक्टर मृणाल मीणा से मुलाकात की। दल ने पुनर्वास स्थल पर तत्काल एंबुलेंस, अस्थायी शौचालय, मेडिकल टीम, आंगनवाड़ी, स्कूल और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की। बारिश में खराब हुए अनाज के बदले ग्रामीणों को अच्छा अनाज उपलब्ध कराने की मांग भी रखी गई।
इसके अलावा ग्रामीणों और आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने तथा रोजगार गारंटी योजना के तहत विस्थापित ग्रामीणों को तत्काल रोजगार उपलब्ध कराने की मांग की गई। जांच दल के अनुसार कलेक्टर ने इन मांगों पर तत्काल कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
सीपीआई जांच दल ने कहा है कि वह जल्द ही अपनी विस्तृत रिपोर्ट जारी करेगा और दोबारा क्षेत्र का दौरा कर प्रशासन की ओर से किए गए दावों और व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करेगा।




