नई दिल्ली। बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा (बीएफएसआई) सेक्टर की साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाने के उद्देश्य से सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी के तहत 'डिजिटल थ्रेट रिपोर्ट 2025-26: फ्रॉम फ्रंटलाइन इंटेलिजेंस टू कलेक्टिव फोरसाइट' जारी की गई। इस मौके पर साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने कहा कि भारत अब केवल अपने डिजिटल इकोसिस्टम की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक साइबर सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभा रहा है। रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के दौर में बढ़ते साइबर खतरों से निपटने के लिए संगठनों को व्यावहारिक और प्रभावी सुझाव दिए गए हैं।सीसा (एसआईएसए) के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) दर्शन शांतमूर्ति ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि यह डिजिटल थ्रेट रिपोर्ट केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उन्होंने बताया कि आज भारत दुनिया के लगभग 49 प्रतिशत रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट ट्रांजैक्शन संभालता है, जो भारत के मजबूत और भरोसेमंद डिजिटल भुगतान तंत्र का परिणाम है।
उन्होंने आईएएनएस से कहा कि भारत सरकार और सीसा ने मिलकर यह रिपोर्ट तैयार की है ताकि उद्योग जगत और वैश्विक समुदाय साइबर सुरक्षा को और मजबूत बना सके। उन्होंने बताया कि यह रिपोर्ट भविष्य के खतरों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है और संस्थानों को पहले से तैयार रहने में मदद करेगी।
दर्शन शांतमूर्ति ने आगे कहा कि यह दिन सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। उन्होंने बताया कि यह इस साझेदारी के तहत जारी की गई दूसरी डिजिटल थ्रेट रिपोर्ट है। पहली रिपोर्ट को दुनिया भर से शानदार प्रतिक्रिया मिली थी। उसे 20,000 से अधिक बार डाउनलोड किया गया और विभिन्न उद्योगों के साथ करीब 350 ब्रीफिंग सेशन आयोजित किए गए।
उन्होंने कहा, "इस पहल का उद्देश्य केवल साइबर हमलों के बाद प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि पहले से जागरूकता बढ़ाकर संस्थानों को सुरक्षित बनाना है। भारत, जो दुनिया में सबसे अधिक डिजिटल भुगतान करता है, उसकी जिम्मेदारी केवल अपने सिस्टम की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक साइबर सुरक्षा में योगदान देना भी है।"
दर्शन शांतमूर्ति ने बताया कि रिपोर्ट में विशेष रूप से पिछले 6 महीनों में तेजी से बढ़े एआई-आधारित साइबर खतरों का विश्लेषण किया गया है। इसमें विस्तार से बताया गया है कि संस्थानों को साइबर हमलों से बचने के लिए कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए। रिपोर्ट केवल जोखिमों की पहचान नहीं करती, बल्कि उनके समाधान के लिए व्यावहारिक और लागू किए जा सकने वाले सुझाव भी देती है।
वहीं, भारतीय कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी-इन) के महानिदेशक डॉ. संजय बहल ने आईएएनएस से कहा कि डिजिटल थ्रेट रिपोर्ट का यह दूसरा संस्करण है। उन्होंने बताया कि पहली रिपोर्ट में सात ऐसे क्षेत्रों की पहचान की गई थी, जहां साइबर खतरे बढ़ने की आशंका जताई गई थी। अब उनमें से छह क्षेत्रों में खतरे और जोखिम स्पष्ट रूप से बढ़ चुके हैं।
उन्होंने कहा कि केवल क्वांटम टेक्नोलॉजी से जुड़ा जोखिम अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है, लेकिन अगले एक-दो वर्षों में उसके भी बढ़ने की संभावना है। बाकी सभी क्षेत्रों में साइबर जोखिम तेजी से बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
डॉ. संजय बहल ने आईएएनएस को बताया, "सरकार लगातार डिजिटल फ्रॉड और साइबर अपराधों पर नियंत्रण के लिए काम कर रही है, लेकिन नागरिकों और संस्थानों को भी साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक रहना होगा। साथ ही बदलती तकनीक के साथ सुरक्षा उपायों को भी लगातार मजबूत करना जरूरी है।"
एआई के कारण नौकरियों पर पड़ने वाले असर के सवाल पर डॉ. बहल ने कहा कि इतिहास बताता है कि हर नई तकनीक के आने पर ऐसी आशंकाएं पैदा होती हैं। जब सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) आई थी, तब भी लोगों को नौकरी जाने का डर था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि एआई के दौर में सबसे जरूरी है री-स्किलिंग और नई तकनीकों के अनुसार खुद को तैयार करना। जो लोग समय के साथ नए कौशल सीखेंगे, उनके लिए रोजगार और अवसर दोनों बढ़ेंगे। एआई को खतरे के बजाय अवसर के रूप में देखने की जरूरत है।
डॉ. बहल ने आगे कहा कि भारत ने साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए एआई बिल ऑफ मटेरियल्स सहित कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनमें सॉफ्टवेयर बिल ऑफ मटीरियल्स, हार्डवेयर बिल ऑफ मटीरियल्स, क्रिप्टो बिल ऑफ मटीरियल्स, क्वांटम बिल ऑफ मटीरियल्स और एआई बिल ऑफ मटीरियल्स शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि अब तक दुनिया में केवल सॉफ्टवेयर बिल ऑफ मैटेरियल्स पर ही काम हुआ था, लेकिन भारत ने पहली बार एआई सहित कई उभरती तकनीकों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार किए हैं। इससे भविष्य में साइबर सुरक्षा को और मजबूत बनाने में मदद मिलेगी।




