ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने वसीयत के आधार पर जमीन के नामांतरण (Mutation) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि एक ही संपत्ति को लेकर दो अलग-अलग या परस्पर विरोधी वसीयत (Wills) सामने आती हैं, तो तहसीलदार, एसडीएम या राजस्व आयुक्त (Revenue Commissioner) को उनकी कानूनी वैधता तय करने का अधिकार नहीं है। ऐसे विवादों का निपटारा केवल सक्षम सिविल कोर्ट (Civil Court) ही कर सकता है।


जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की पीठ ने शिवपुरी जिले की नरवर तहसील के ग्राम सिकंदर से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए एडिशनल कमिश्नर ग्वालियर, एसडीएम नरवर और तहसीलदार द्वारा जारी तीनों राजस्व आदेशों को निरस्त कर दिया है। इसके साथ ही राजस्व विभाग को 11 फरवरी 2020 से पूर्व की मूल स्थिति जमीन के रिकॉर्ड में बहाल करने के सख्त निर्देश दिए हैं।


क्या था पूरा मामला?

ग्राम सिकंदर स्थित सर्वे नंबर 1203/2, 1210 से 1218, 1220, 1359 और 1204 की कृषि भूमि मूल खातेदार बाल किशन के नाम दर्ज थी। बाल किशन के निधन के बाद विनोद कुमार एवं अन्य ने 28 जनवरी 2011 की एक अपंजीकृत (Unregistered) वसीयत के आधार पर नामांतरण का आवेदन दिया। सुनवाई के दौरान दूसरे पक्ष के जीतेश ने आपत्ति दर्ज कराते हुए बाल किशन द्वारा 9 नवंबर 2013 को निष्पादित की गई बाद की वसीयत प्रस्तुत कर दी और जमीन पर अपना दावा ठोका।


हाईकोर्ट का मुख्य निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने माना कि जब एक ही भूमि के लिए दो दावेदार अलग-अलग तिथियों की वसीयत पेश करते हैं, तो वसीयत असली है या फर्जी, इसका परीक्षण करना राजस्व अधिकारियों के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) से बाहर है। वसीयत की वैधता, निष्पादन (Execution) और उस पर अधिकारों का अंतिम फैसला केवल सिविल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों की जांच के बाद ही किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने राजस्व अधिकारियों के आदेशों को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि मामले में पक्षकार अपनी वसीयत के अधिकारों की पुष्टि के लिए सक्षम सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाएं और तब तक राजस्व रिकॉर्ड में पुरानी स्थिति यथावत रखी जाए।