भोपाल। भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी तथा उनकी बहन अंबिका शुक्ला को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर) से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने दोनों बहनों की रिट अपील को निरस्त करते हुए भोपाल स्थित अरबों रुपये मूल्य की 522 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर उनके रिश्ते के भाई वी.एम. सिंह (VM Singh) के नामांतरण का रास्ता पूरी तरह साफ कर दिया है। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही वर्ष 1975 से चला आ रहा 51 साल पुराना जमीन विवाद अब समाप्त हो गया है।
522 एकड़ जमीन और विवाद की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला भोपाल की हुजूर तहसील के अंतर्गत बहेटा, बोरबन और लाऊखेड़ी क्षेत्र की 522 एकड़ की विशाल और कीमती पुश्तैनी भूमि से जुड़ा हुआ है। विवाद की शुरुआत वर्ष 1975 में दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक पारिवारिक विभाजन वाद (Partition Suit) से हुई थी। पारिवारिक समझौते के आधार पर 1993 में दिल्ली हाईकोर्ट ने डिक्री पारित की थी। इस फैसले को मेनका गांधी ने चुनौती दी थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने भी 1993 के समझौते की डिक्री को बरकरार रखा था।
हाईकोर्ट ने क्यों निरस्त की अपील?
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (ACJ) विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि समझौते के बाद अपीलकर्ताओं (मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला) के अधिकार इस संपत्ति पर समाप्त हो चुके थे।
हक त्यागपत्र (Relinquishment) पड़ा भारी
वी.एम. सिंह ने कोर्ट में दलील दी कि मेनका गांधी की मां (अमतेश्वर आनंद) ने मध्य प्रदेश में स्थित सभी पुश्तैनी जमीनों और संपत्तियों से अपना और अपने वारिसों (संतानों) का हक लिखित रूप से त्याग (Relinquish) कर दिया था। कोर्ट ने पाया कि जिन आपत्तियों को सुप्रीम कोर्ट पहले ही निरस्त कर चुका था, उन्हें ही पुनः आधार बनाकर अपील दायर की गई थी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिका खारिज किए जाने के बाद भोपाल के राजस्व अधिकारियों ने फैसले के क्रियान्वयन (Execution) की प्रक्रिया शुरू कर दी है। राजस्व अभिलेखों में विवादित भूमि का नामांतरण अब वी.एम. सिंह के नाम पर दर्ज करने का रास्ता साफ हो गया है।




