छतरपुर(संजय अवस्थी)। छतरपुर के निर्वाना फाउंडेशन ने मानवता और सेवा की एक अनूठी मिसाल पेश की है। डिप्रेशन के कारण करीब तीन साल पहले अपने घर से भटककर छतरपुर पहुंची बैंगलोर की 40 वर्षीय अनुराधा शेट्टी आखिरकार पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने परिवार से मिल गईं। बुधवार को उनके भाई और भाभी उन्हें लेने के लिए बैंगलोर से छतरपुर पहुंचे, जहां फाउंडेशन के सदस्यों ने बेहद भावुक माहौल में अनुराधा को तिलक लगाकर और उपहार देकर विदा किया। तीन साल बाद अपनी खोई हुई बहन को सही-सलामत वापस पाकर परिजनों की आंखें खुशी से छलक आईं।


निर्वाना फाउंडेशन के संजय सिंह ने बताया कि लगभग तीन साल पहले जब अनुराधा छतरपुर में मिली थीं, तब उनकी मानसिक स्थिति बेहद खराब थी। वह बैंगलोर में रहने के दौरान लगातार टीवी देखने और अकेलेपन के कारण गहरे डिप्रेशन का शिकार हो गई थीं और इसी स्थिति में वह घर से निकलकर यहां आ पहुंची थीं। फाउंडेशन में लाने के बाद लगभग एक वर्ष तक संस्था के सदस्यों ने उन्हें भरपूर सेवा, अपनापन और उचित दवाइयां दीं, जिससे उनकी सेहत में चमत्कारी सुधार आया। पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद पिछले दो सालों से अनुराधा स्वयं संस्था की एक मजबूत स्तंभ बन गईं और वहां मौजूद बच्चों को पढ़ाने-लिखाने से लेकर उनकी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी संभाल रही थीं।


अनुराधा के परिवार को खोजने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। पिछले महीने स्वास्थ्य में पूरी तरह सुधार होने पर अनुराधा ने कुछ पुराने मोबाइल नंबर याद करके बताए। संस्था द्वारा जब उन नंबरों पर संपर्क किया गया, तो अनुराधा के परिवार का पता चल सका। इतने सालों तक कोई सुराग न मिलने के कारण उम्मीद छोड़ चुके परिजन फोन कॉल आते ही बेहद भावुक हो गए। इसके बाद वीडियो कॉल के जरिए अनुराधा की उनके भाई-बहन से बात कराई गई और उनके छतरपुर में सुरक्षित होने की पुष्टि की गई।


घर वापसी के समय भावुक हुईं अनुराधा शेट्टी ने कहा कि शायद मेरी किस्मत में ही यहां आना लिखा था। यहां के लोगों ने दूसरे माता-पिता बनकर मेरा पालन-पोषण किया और मुझे ठीक किया। अब मैं भगवान से यही मन्नत मांगूंगी कि मेरे जैसे अन्य परेशान लोगों को भी इसी तरह का सहारा मिले। वहीं अपनी बहन को लेने दो हजार किलोमीटर दूर बैंगलोर से छतरपुर पहुंचे भाई धनंजय ने रुंधे गले से संस्था का आभार जताया। उन्होंने कहा कि बहन के लापता होने के बाद वे लोग गहरे सदमे में थे, क्योंकि लड़कियों के बाहर अकेले रहने में सुरक्षा की बड़ी चिंता होती है। लेकिन जब उन्हें फोन पर पता चला कि उनकी बहन यहां पूरी सुरक्षा और सम्मान के साथ रह रही है, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने निर्वाना फाउंडेशन की नि:स्वार्थ सेवा के लिए सभी सदस्यों का दिल से धन्यवाद किया।