पांढुर्णा, जीशान अंसारी। मध्यप्रदेश के पांढुर्णा में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक गोटमार मेला एक बार फिर खूनी संघर्ष का गवाह बना। जाम नदी के बीच लगाए गए झंडे पर कब्जे को लेकर पांढुर्णा और सावरगांव के लोगों के बीच जमकर पत्थरबाजी हुई, जिसमें 1000 से अधिक लोग घायल हो गए। घायलों में 9 लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही है, जबकि एक व्यक्ति के पैर की हड्डी टूट गई है।


परंपरा के तहत आयोजित इस मेले में जैसे ही झंडे पर कब्जे की होड़ शुरू हुई, दोनों पक्षों की ओर से पत्थरों की बौछार शुरू हो गई। देखते ही देखते पूरा मेला क्षेत्र रणभूमि में तब्दील हो गया। पत्थरों से बचने के लिए लोग इधर-उधर भागते नजर आए और मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया।


घायलों को तत्काल मौके पर बनाए गए अस्थायी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों तक पहुंचाया गया। प्रशासन ने मेले को देखते हुए पहले से व्यापक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा इंतजाम किए थे। मेला क्षेत्र में 7 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र, 44 डॉक्टर और 22 एंबुलेंस तैनात की गई थीं। गंभीर रूप से घायल लोगों को प्राथमिक उपचार के बाद बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया।


सुरक्षा व्यवस्था के लिए करीब 700 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। इसके अलावा भीड़ और पत्थरबाजी पर निगरानी रखने के लिए 10 सीसीटीवी कैमरे और 3 ड्रोन भी लगाए गए थे।


गौरतलब है कि गोटमार मेला पांढुर्णा की वर्षों पुरानी परंपरा है। जाम नदी के दोनों किनारों पर पांढुर्णा और सावरगांव के लोग एकत्रित होते हैं और नदी के बीच लगाए गए झंडे पर कब्जे के लिए एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। हालांकि समय के साथ यह परंपरा लगातार विवादों और हादसों का कारण बनती रही है।


उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1955 से 2025 के बीच गोटमार मेले में 14 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि हर साल बड़ी संख्या में लोग घायल होते हैं। प्रशासन ने इस परंपरा को सुरक्षित बनाने के लिए कई प्रयास किए। पत्थरों के स्थान पर रबर बॉल के उपयोग का प्रयोग भी किया गया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका और कुछ ही देर बाद फिर पत्थरबाजी शुरू हो गई।


गोटमार मेले की उत्पत्ति को लेकर भी अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ लोग इसे भोसला राजाओं के सैनिकों के युद्धाभ्यास से जोड़ते हैं, जबकि एक लोकप्रिय कथा इसे पांढुर्णा के युवक और सावरगांव की युवती की प्रेम कहानी से संबंधित बताती है। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप बदल गया है और गोफन के इस्तेमाल, कथित अवैध शराब तथा बढ़ती आक्रामकता ने आयोजन को और अधिक खतरनाक बना दिया है।


हर वर्ष होने वाले इस आयोजन के बाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या परंपरा के नाम पर लोगों की जान जोखिम में डालना उचित है, या फिर इस ऐतिहासिक मेले को सुरक्षित स्वरूप देने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।