उत्तराखंड। देवभूमि उत्तराखंड में स्थित नीलकंठ मंदिर भारत की पौराणिक संस्कृति और आस्था की पहचान माना जाता है। सदियों से ये स्थान साधु-संतों, ऋषियों और भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। श्रावण मास में इस स्थान पर भक्तों की अपार भीड़ देखने को मिलती है।

मंदिर की वास्तुकला और यहां का माहौल आज भी वही प्राचीन ऊर्जा महसूस कराता है। ऐसी मान्यता है कि यहीं पर भोलेनाथ ने समुद्र मंथन का विष पिया था।

बुधवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मंदिर की विशेषता पर प्रकाश डाला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का वीडियो पोस्ट कर लिखा, "ऋषिकेश के निकट पौड़ी गढ़वाल जनपद में स्थित देवाधिदेव महादेव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर अत्यंत पावन तीर्थस्थल है। पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण यह धाम सावन मास में विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है। देशभर से लाखों शिवभक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर नीलकंठ महादेव पहुंचते हैं और भोलेनाथ का जलाभिषेक कर उनकी कृपा एवं आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। पौड़ी गढ़वाल जनपद आगमन पर आप भी इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।"

नीलकंठ महादेव मंदिर उत्तराखंड में पौड़ी गढ़वाल जिले में ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर दूर, मणिकूट पर्वत पर स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को यहीं गले में रोकने के कारण शिवजी का गला नीला हुआ था। विषपान के बाद उसकी गर्मी को शांत करने के लिए भगवान शिव ने यहां हजारों साल तक वटवृक्ष के नीचे समाधि लगाकर तपस्या की थी। तपस्या पूरी होने के बाद शिवजी ने यहीं अपने कंठ के प्रतीक रूप में शिवलिंग को स्थापित किया था। मंदिर में कंठ के आकार का स्वयंभू शिवलिंग है।

मधुमती और पंकजा नदियों के संगम के पास तीन पहाड़ियों, ब्रह्मकूट, विष्णुकूट और मणिकूट के बीच बसे मंदिर के शिखर पर समुद्र मंथन का सुंदर और सजीव दृश्य उकेरा गया है। सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर यहां बहुत भारी भीड़ होती है और लाखों कांवड़िए गंगाजल चढ़ाने आते हैं।