बीजिंग। 17 और 19 अक्टूबर को जापान की प्रधानमंत्री ताकाइची सानाए ने यासुकुनी मंदिर में चढ़ावा और पूजा शुल्क अर्पित किया। कई मंत्रिमंडल के मंत्रियों और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के शीर्ष नेताओं ने भी वहां दर्शन किए। टोक्यो परीक्षण के 80वें वर्ष में जापानी राजनेताओं का लगातार 'भूत-पूजन' युद्ध-अपराधियों को बरी करने, आक्रमण को पलटने और 'पुनः सैन्यीकरण' का मार्ग प्रशस्त करने के दुर्भावनापूर्ण इरादे को उजागर करता है।
चीनी विदेश मंत्रालय ने कड़ा विरोध और गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रालय ने भी जापान से इतिहास का सामना करने का आग्रह किया है।
यासुकुनी मंदिर कोई साधारण धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वस्तुतः एक 'युद्ध-अपराधी देवालय' है, जहां तोजो हिदेकी, मात्सुई इवाने सहित 14 द्वितीय विश्वयुद्ध के ए-श्रेणी युद्ध-अपराधी पूजित हैं। यह जापानी सैन्यवाद का आध्यात्मिक प्रतीक है। टोक्यो परीक्षण ने इन अपराधियों को इतिहास के कलंक-स्तंभ पर अंकित किया, फिर भी जापानी सैन्यवाद का पूर्ण रूप से सफाया नहीं हुआ।
1978 में जापान में दक्षिणपंथी ताकतों ने ए-श्रेणी युद्ध-अपराधियों को गुप्त रूप से यासुकुनी मंदिर में मिलाकर पूजित किया। हाल ही में जापानी मीडिया द्वारा उजागर यासुकुनी मंदिर की आंतरिक बैठक के रिकार्ड से पता चलता है कि जापान सरकार ने 1960 के दशक में ही ए-श्रेणी युद्ध-अपराधियों की पूजा पर व्यवस्था बना ली थी, परंतु उसे गुप्त रखा, जो साबित करता है कि वह जानती थी कि यह अत्यंत शर्मनाक है।
ताकाइची सानाए ने सार्वजनिक रूप से यासुकुनी मंदिर को 'शांति का मंदिर' कहा और पिछले 20 वर्षों में लगभग हर वर्ष 'भूत-पूजन' किया। इसका सार टोक्यो परीक्षण के ऐतिहासिक निर्णय को नकारना तथा अंतर्राष्ट्रीय न्याय और मानवीय चेतना को चुनौती देना है। जापानी संविधान विशेषज्ञ प्रोफेसर शिमिज़ु मासाहिको ने आलोचना करते हुए कहा कि यह जर्मन नेता द्वारा हिटलर की कब्र पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के समान है, जो ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्णतः अस्वीकार्य है।
जापानी राजनेताओं का 'भूत-पूजन' ऐतिहासिक संशोधनवाद की पूरी कार्ययोजना का एक अंग है। वर्षों से जापानी दक्षिणपंथी पाठ्यपुस्तकों में हेरफेर, राजनीतिक गतिविधियों आदि के माध्यम से आक्रमण के इतिहास को विकृत करते रहे हैं। वे आक्रमण को 'एशिया की मुक्ति' के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबरन वेश्याओं और नानजिंग नरसंहार को 'काल्पनिक' बताते हैं, तथा टोक्यो परीक्षण को खुलकर 'विजेता का पराजित पर फैसला' कहते हैं।
हाल ही में यह भी उजागर हुआ कि उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके अंतर्राष्ट्रीय बड़े मॉडलों में भ्रामक डेटा फैलाकर वैश्विक जनता की द्वितीय विश्वयुद्ध की ऐतिहासिक समझ को विकृत करने का प्रयास किया, जिसकी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने कड़ी निंदा की।
चिंता की बात यह है कि इतिहास को विकृत करना जापान के त्वरित "पुनः सैन्यीकरण" से गहराई से जुड़ा है। 'युद्ध-अपराधी देवालय' की पूजा का उद्देश्य सामाजिक युद्ध-विरोधी सहमति को कमजोर करना, युद्ध न देखे युवाओं को भ्रमित करना और युद्धोत्तर व्यवस्था की बेड़ियों से मुक्त होकर सैन्य विस्तार का मार्ग प्रशस्त करना है।
वर्तमान में जापान इस खतरनाक रास्ते पर और आगे बढ़ रहा है। ताकाइची सानाए ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिर से संयुक्त राष्ट्र चार्टर के 'शत्रु राष्ट्र खंड' को हटाने का उल्लेख किया। उन्होंने संकेत दिया कि वर्ष के अंत में 'सुरक्षा तीन दस्तावेजों' के संशोधन के समय 'परमाणु-रहित तीन सिद्धांतों' के प्रावधान को समायोजित किया जा सकता है और परमाणु-संचालित पनडुब्बियों की शुरूआत पर विचार किया जा रहा है।
जापान की नई 'रक्षा बल संवर्धन योजना' में बड़ी संख्या में ड्रोन की खरीद, गोला-बारूद और मिसाइल भंडार बढ़ाने का प्रस्ताव है। अगले 5 वर्षों में जापान का रक्षा व्यय 70 से 80 ट्रिलियन येन तक बढ़ सकता है। 'नया सैन्यवाद' तलवारें तेज कर रहा है। जापान और विदेश में चिंता व्यक्त की जा रही है। जापान के कई स्थानों पर फिर से विरोध प्रदर्शन हुए।
इतिहास को विकृत नहीं किया जा सकता, न्याय का अपमान नहीं किया जा सकता। इतिहास को सही ढंग से समझना और उसका सामना करना जापान के अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में वापसी की महत्वपूर्ण पूर्व-शर्त है, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के विकास का राजनीतिक आधार है, और उसकी शांतिपूर्ण विकास की प्रतिबद्धता की कसौटी है। जापानी दक्षिणपंथी द्वारा आक्रमण के इतिहास को सुंदर बनाने, युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देने और सैन्यवाद को पुनर्जीवित करने की उलटी कार्रवाइयों को चीन सहित युद्ध-पीड़ित देश कभी नजरअंदाज नहीं करेंगे। जो भी जोखिम उठाकर आक्रमण और विस्तार के पुराने रास्ते पर चलने की हिम्मत करेगा, उसका पूर्ण रूप से सफाया किया जाएगा।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
















