नई दिल्लीकटहल का जिस छिलके को अक्सर कचरा समझकर फेंक दिया जाता है, उसी से अब दूषित पानी को साफ करने का रास्ता निकला है। शोधकर्ताओं ने कटहल के छिलके से ऐसी विशेष सामग्री विकसित की है, जो 10 मिनट में पानी से 90 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटाने में सफल रही। इस नवाचार को पेटेंट भी मिल चुका है। यह रिसर्च राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने की है। इस तकनीक में कटहल के छिलकों से सक्रिय कार्बन तैयार किया जाता है। इसके बाद उसमें जिरकोनियम मिलाकर पानी से फ्लोराइड पकड़ने की क्षमता बढ़ाई जाती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह सामग्री खास तौर पर उन क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है, जहां भूजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा पेयजल की गुणवत्ता और लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पानी में फ्लोराइड की अधिक मात्रा से दांतों और हड्डियों से जुड़ी फ्लोरोसिस की समस्या हो सकती है।

देश के कई हिस्सों में भूजल में फ्लोराइड की मौजूदगी के कारण सस्ती और टिकाऊ जल शोधन तकनीकों की जरूरत महसूस की जा रही है। फ्लोराइड हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ मौजूदा तकनीकों की अपनी सीमाएं हैं। मसलन आरओ प्रक्रिया में काफी पानी व्यर्थ होता है और कैल्शियम व मैग्नीशियम जैसे उपयोगी खनिज भी पानी से बाहर निकल सकते हैं। वहीं, कुछ अन्य विधियों में रसायनों का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में कृषि अपशिष्ट से तैयार यह नई सामग्री एक वैकल्पिक उपाय बन सकती है।

एनआईटी राउरकेला की प्रोफेसर सुस्मिता मिश्रा और शोधार्थी डॉ. प्रतिमा मिंज के शोध दल ने यह तकनीक विकसित की है। प्रो. मिश्रा ने बताया कि शोध का मुख्य उद्देश्य कृषि अपशिष्ट का उपयोग जल शुद्ध करने के लिए करना था। कटहल के छिलकों से तैयार सक्रिय कार्बन को जिरकोनियम से संशोधित करने के बाद प्रयोगशाला में उत्साहजनक परिणाम मिले। परीक्षणों में 1 से 5 मिलीग्राम प्रति लीटर फ्लोराइड वाले पानी पर इस सामग्री का प्रयोग किया गया। शोध दल ने 10 से 20 मिनट के भीतर 90 से 97 प्रतिशत से अधिक फ्लोराइड हटाने की क्षमता दर्ज की।

हालांकि, ये परिणाम प्रयोगशाला में जांची गई परिस्थितियों पर आधारित हैं। वास्तविक उपयोग में इसकी प्रभावशीलता का आकलन अभी किया जाना है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें फेंके जाने वाले कृषि अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदला गया है। इससे भविष्य में ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में घरों तथा सामुदायिक स्तर पर पानी साफ करने के विकल्प विकसित करने में मदद मिल सकती है।

शोध को प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर-4 तक पहुंचाया गया है। शोध दल ने बिजली और रसायनों की लागत को शामिल करते हुए इस सामग्री को तैयार करने की अनुमानित लागत करीब 37 रुपये प्रति ग्राम बताई है। अब टीम इसका भौतिक नमूना विकसित करने के साथ व्यावहारिक उपयोग, लंबे समय तक काम करने की क्षमता और संचालन लागत का आकलन करेगी।