भोपाल। शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके बाद राज्यों द्वारा जारी आदेशों ने लाखों शिक्षकों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षक इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। आइए समझते हैं कि आखिर TET क्या है, पूरा मामला क्या है और विवाद क्यों खड़ा हुआ है।


क्या है TET (Teacher Eligibility Test)

टीईटी यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा एक राष्ट्रीय स्तर की योग्यता परीक्षा है, जो यह तय करती है कि कोई व्यक्ति कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने के लिए योग्य है या नहीं। यह परीक्षा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा तय मानकों के आधार पर आयोजित होती है। TET का उद्देश्य देशभर में शिक्षकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना और एक समान मानक लागू करना है।


TET कब और क्यों लागू हुआ

शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) 2009 लागू होने के बाद, NCTE ने 23 अगस्त 2010 को अधिसूचना जारी कर दी, जिसमें कहा गया कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर शिक्षक बनने के लिए TET पास करना अनिवार्य होगा। इसके बाद 2011 से TET परीक्षा आयोजित की जाने लगी।


पुराने शिक्षकों को दी गई थी छूट

जब यह नियम लागू हुआ, तब पहले से कार्यरत शिक्षकों को तत्काल TET पास करने की बाध्यता नहीं दी गई थी। उन्हें कुछ वर्षों का समय दिया गया और कई मामलों में यह छूट बढ़ाई भी गई। इसी आधार पर हजारों शिक्षक बिना TET के ही वर्षों से सेवा दे रहे हैं।


सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला

1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि जिन शिक्षकों की सेवा में 5 वर्ष से अधिक समय बचा है, उन्हें दो साल के भीतर TET पास करना अनिवार्य होगा।
यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उन्हें या तो इस्तीफा देना होगा या अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) दी जा सकती है।

हालांकि, जिन शिक्षकों की रिटायरमेंट में 5 साल से कम समय बचा है, उन्हें इस नियम से छूट दी गई है।


किस पर लागू होगा यह आदेश

यह आदेश सरकारी, अनुदानित, निजी और गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू होगा, जो RTE एक्ट के दायरे में आते हैं।
अल्पसंख्यक संस्थानों पर यह लागू होगा या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच फैसला करेगी।


विवाद की जड़ – ‘रेट्रोस्पेक्टिव’ लागू करना

शिक्षकों का सबसे बड़ा विरोध इस बात को लेकर है कि यह फैसला पुराने शिक्षकों पर भी लागू किया जा रहा है। उनका कहना है कि जब उनकी नियुक्ति हुई थी, तब TET अनिवार्य नहीं था।
ऐसे में अब वर्षों बाद इस नियम को लागू करना “रेट्रोस्पेक्टिव” यानी पूर्वव्यापी निर्णय है, जो कानूनन और नैतिक रूप से गलत है।


शिक्षकों की मुख्य आपत्तियां

20-25 साल की सेवा देने के बाद परीक्षा देना अपमानजनक

नियुक्ति के समय लागू नियमों का पालन किया गया था

रिटायरमेंट के करीब शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव

नौकरी जाने का खतरा

अनुभव की अनदेखी

कई शिक्षकों ने यह भी सवाल उठाया कि क्या इसी तरह अन्य सरकारी अधिकारियों से भी समय-समय पर परीक्षा ली जाएगी?


मध्य प्रदेश में बढ़ता विरोध

भोपाल सहित कई जिलों में शिक्षक सड़कों पर उतर आए हैं।
शिक्षक संगठनों ने प्रदर्शन कर सरकार से आदेश वापस लेने की मांग की है।
उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन और उग्र होगा।


सरकार का पक्ष

राज्य सरकार का कहना है कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर लागू किया गया है।
हालांकि, मध्य प्रदेश सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) भी दाखिल कर दी है।


कितने शिक्षक होंगे प्रभावित

शिक्षक संगठनों के अनुसार:

करीब 1.5 लाख शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं

इनमें लगभग 70 हजार शिक्षक 2011 से पहले नियुक्त हुए हैं

देशभर में यह संख्या 10 लाख तक बताई जा रही है।


कानूनी पहलू क्या कहते हैं

RTE Act 2009 की धारा 23 के अनुसार, शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता तय करने का अधिकार NCTE को है।
इसी के तहत TET को अनिवार्य किया गया।

हालांकि, कई हाईकोर्ट पहले यह कह चुके हैं कि पुराने शिक्षकों पर यह नियम लागू नहीं होना चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले ने स्थिति बदल दी है।


क्या है Review Petition (पुनर्विचार याचिका)

पुनर्विचार याचिका वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी फैसले के खिलाफ उसी अदालत से उसे दोबारा देखने की मांग की जाती है।
आमतौर पर यह प्रक्रिया सीमित आधारों पर होती है और जज अपने चैंबर में ही फैसला लेते हैं।


शिक्षक संगठनों की मांगें

पुराने शिक्षकों को TET से छूट दी जाए

सुप्रीम कोर्ट में मजबूत पक्ष रखा जाए

आदेश को वापस या संशोधित किया जाए

सेवा सुरक्षा सुनिश्चित की जाए


आगे क्या हो सकता है

अब इस पूरे मामले की दिशा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल रिव्यू पिटीशन पर निर्भर करेगी।
यदि कोर्ट अपने फैसले में संशोधन करता है, तो शिक्षकों को राहत मिल सकती है।
वहीं अगर फैसला बरकरार रहता है, तो लाखों शिक्षकों को TET परीक्षा देनी होगी।


निष्कर्ष

TET का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना है, लेकिन इसके लागू करने के तरीके ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।
एक तरफ सरकार और न्यायालय शिक्षा में सुधार की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ शिक्षक इसे अपने अधिकारों और सम्मान पर चोट मान रहे हैं। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी है, जो यह तय करेगा कि अनुभव बड़ा है या परीक्षा।