नई दिल्ली। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने शनिवार को दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए अपनी तरह की पहली 'वायु प्रदूषण विश्लेषण' सुविधा का उद्घाटन किया।

एकीकृत वायुमंडलीय रसायन विज्ञान एवं एरोसोल विषाक्तता विश्लेषण प्रयोगशाला (एएटीएल) के नाम से जानी जाने वाली यह सुविधा वायु प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों की पहचान करने में भी सक्षम है।

उद्घाटन समारोह आईआईटीएम की दिल्ली शाखा में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. टी. श्रीनिवास कुमार, आईआईटीएम के निदेशक डॉ. ए. सूर्यचंद्र राव और आईएमडी के महानिदेशक डॉ. महापात्रा की उपस्थिति में हुआ।

एएटीएल वैज्ञानिकों को वायु प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों (वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक गतिविधि, बायोमास और फसल अवशेषों का दहन, निर्माण और सड़क की धूल) और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले प्रदूषकों के बीच अंतर करने में मदद करेगा।

इन स्रोतों के सापेक्ष योगदान का अनुमान लगाकर, यह सुविधा अधिकारियों को यह समझने में मदद करेगी कि किसी विशेष समय पर कौन सी गतिविधिया खराब वायु गुणवत्ता का कारण बन रही हैं और कहाँ हस्तक्षेप सबसे अधिक प्रभावी हो सकते हैं।

यह प्रयोगशाला वायुमंडलीय गैसों और एरोसोल की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने के लिए उन्नत उपकरणों से सुसज्जित है, जिसमें महीन कण पदार्थ (पीएम2.5), धातुएं, विषैले तत्व और अन्य घटक शामिल हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 'मिशन मौसम' के तहत इस सुविधा की स्थापना की गई है, जिसका उद्देश्य वायुमंडलीय प्रदूषण की वैज्ञानिक समझ को मजबूत करना और दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए ठोस प्रमाण उपलब्ध कराना है।

यह प्रयोगशाला एक एकीकृत ढांचे के भीतर उन्नत वायुमंडलीय मापन उपकरणों, विस्तृत रासायनिक विश्लेषण, प्रदूषण स्रोत की पहचान और निर्णय-सहायता क्षमताओं को एक साथ लाती है।

डॉ. सिंह ने कहा कि वायु प्रदूषण को लेकर जनता की गंभीर चिंता को देखते हुए दिल्ली-एनसीआर को चुना गया है। उन्होंने कहा कि यह सुविधा वायु गुणवत्ता आकलन को केवल प्रदूषण स्तरों की रिपोर्टिंग तक सीमित न रखकर, प्रदूषकों की संरचना, उनके स्रोतों, उनके सापेक्ष योगदान और उनके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों की पहचान करने में सहायक होगी, साथ ही वास्तविक समय की जानकारी और अग्रिम पूर्वानुमान प्रदान करेगी ताकि समय पर कार्रवाई की जा सके।

भारत ने पिछले 10-12 वर्षों में वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान और विश्लेषण में उल्लेखनीय प्रगति की है।

उन्होंने कहा कि यह नई सुविधा एक महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि इससे न केवल यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि वायुमंडल में कितना प्रदूषण मौजूद है, बल्कि यह भी पता चलेगा कि यह किस चीज से बना है और इसकी उत्पत्ति कहां से होती है।