उमरिया। मध्य प्रदेश के पुलिस ट्रेनिंग स्कूल (PTS) उमरिया में पदस्थ सब इंस्पेक्टर (SI) अमिताभ प्रताप सिंह (पूर्व नाम अमिताभ थियोफिलिस) का गोंड जनजाति का जाति प्रमाण पत्र राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने अमान्य कर दिया है। समिति ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी सेवा प्राप्त करने के मामले में विस्तृत जांच के बाद यह कड़ा फैसला सुनाया है।
अवैध दस्तावेज और खारिज रिकॉर्ड्स
समिति ने जबलपुर कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक की जांच रिपोर्ट, स्कूल व चर्च के रिकॉर्ड्स और शिकायतकर्ता प्रमिला तिवारी उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया: एसआई द्वारा प्रस्तुत 1997-98 के जाति प्रमाण पत्र का कोई रिकॉर्ड जबलपुर एसडीओ (राजस्व) कार्यालय की दायरा पंजी में दर्ज नहीं पाया गया। एसडीएम कार्यालय गोरखपुर (जबलपुर) से जारी डिजिटल जाति प्रमाण पत्र में भी कई अनियमितताएं मिलने पर उसे पहले ही निरस्त किया जा चुका था। इटारसी और जबलपुर के सेंट पॉल चर्च के मैरिज सर्टिफिकेट्स में जाति का कोई उल्लेख नहीं मिला। वहीं, दादा-दादी के 1939 के कथित विवाह पत्र में जारीकर्ता का नाम नहीं था। पिता की 1989 में हुई मृत्यु का प्रमाण पत्र 31 साल बाद (2020 में) बनवाया गया था, जिसे अमान्य माना गया।
जन्म से क्रिश्चियन, वर्ष 1950 का निवासी प्रमाण भी नहीं
जबलपुर कलेक्टर और एसपी की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ है कि अनावेदक जन्म से ईसाई धर्म से संबंधित हैं और उनका गोंड समुदाय की परंपराओं या संस्कृति से कोई संबंध नहीं रहा है। इसके अलावा, एसआई या उनका परिवार वर्ष 1950 की स्थिति में जबलपुर या रांझी तहसील का मूल निवासी होना सिद्ध नहीं कर पाया।
बच्चों के भी बनवाए फर्जी एसटी प्रमाण पत्र; आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग
शिकायतकर्ता प्रमिला तिवारी उपाध्याय ने समिति के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया कि एसआई ने खुद की नौकरी के साथ-साथ अपने पुत्र सूर्यांश प्रताप सिंह और पुत्री कुमारी स्वर्णा सिंह के भी फर्जी एसटी प्रमाण पत्र बनवाए। शिकायतकर्ता ने आरोपी एसआई पर धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने की धाराओं (420, 467, 468, 471) के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।
बीमारी का बहाना बनाकर बैठकों से अनुपस्थित रहे एसआई
छानबीन समिति ने 30 जून 2026 और 4 अगस्त 2026 को एसआई को पक्ष रखने के लिए समन जारी किए थे। हालांकि, एसआई ने बीमारी व स्टेंट डलने का हवाला देकर समय मांगा, लेकिन निर्धारित समय सीमा के भीतर जाति से संबंधित कोई भी वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। समिति ने पर्याप्त अवसर दिए जाने की बात कहते हुए प्रमाण पत्र निरस्त करने का अंतिम आदेश जारी कर दिया।




