जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के खिलाफ संपत्ति छिपाने के आरोपों को लेकर दाखिल की गई याचिका को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया है कि विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित हो जाने के बाद चुनाव आयोग या जिला निर्वाचन तंत्र के पास किसी प्रत्याशी द्वारा शपथ पत्र में जानकारी छिपाने जैसे आरोपों की समीक्षा करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं रहता।
हाईकोर्ट की एसीजे विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि चुनाव संपन्न होने के बाद किसी भी प्रकार की अनियमितता को केवल निर्धारित समय-सीमा के भीतर चुनाव याचिका (Election Petition) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
क्या था पूरा मामला और याचिकाकर्ता के आरोप
सुरखी विधानसभा क्षेत्र के निवासी और पूर्व प्रत्याशी राजकुमार सिंह ने यह याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि गोविंद सिंह राजपूत ने 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान नामांकन के साथ दाखिल फॉर्म 26 (शपथ पत्र) में अपने, अपनी पत्नी और अपनी पंजीकृत संस्था 'ज्ञानवीर सेवा समिति' के स्वामित्व वाली अचल संपत्तियों की जानकारी छिपाई थी।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान मंत्री राजपूत के अधिवक्ता विवेक रंजन पांडे ने तर्क दिया कि चुनाव परिणाम 17 नवंबर 2023 को घोषित हो चुके थे, जबकि याचिकाकर्ता ने 17 महीने की लंबी अवधि के बाद 21 मार्च 2025 को चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी।
45 दिनों की सख्त समय-सीमा का दिया हवाला
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया था कि वह इस दौरान एक आपराधिक मामले में जेल में बंद था, जिसके कारण शिकायत दर्ज कराने में देरी हुई। चुनाव आयोग द्वारा क्षेत्राधिकार न होने का हवाला देकर शिकायत खारिज किए जाने पर उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81(1) के तहत चुनाव याचिका दायर करने की 45 दिनों की समय-सीमा अत्यंत सख्त है। जेल में होना या कोई अन्य व्यक्तिगत कारण इस 45 दिन की समय-सीमा को बढ़ाने का कानूनी आधार नहीं बन सकता।
आपराधिक परिवाद की समय-सीमा भी हुई समाप्त
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि गलत शपथ पत्र प्रस्तुत करने पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-ए के तहत दंडात्मक कार्रवाई की व्यवस्था है। इसके लिए एक वर्ष की समय-सीमा के भीतर सक्षम आपराधिक अदालत में परिवाद दाखिल करना होता है, लेकिन वह समय-सीमा भी पहले ही बीत चुकी थी।
इन सभी विधिक पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग द्वारा याचिकाकर्ता को भेजे गए जवाब को कानूनी रूप से वैध ठहराया और रिट याचिका को पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया।




