नर्मदापुरम। मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध हिल स्टेशन और पर्यटन स्थल पचमढ़ी में वन्यजीव गौर (इंडियन बाइसन) के हमले में भारतीय सेना की 17 कुमाऊं रेजिमेंट के जवान आकाश चौहान की मौत की घटना ने क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घटना के बाद पचमढ़ी में बाइसन की बढ़ती आवाजाही और उनके व्यवहार को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। वन विभाग पचमढ़ी के एडिशनल डायरेक्टर संजीव शर्मा ने इस पूरे मामले और बाइसन के स्वभाव पर विस्तार से चर्चा की है। आइए जानते हैं इस घटना और वन विभाग के पक्ष से जुड़े प्रमुख बिंदु:


सामान्य स्वभाव के विपरीत था हमला: वन विभाग

वन अधिकारी संजीव शर्मा ने बाइसन के व्यवहार को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य साझा किए हैं: शर्मा ने बताया कि बाइसन का स्वभाव कभी भी सामने से आकर हमला करने वाला नहीं होता। यह वन्यजीव आमतौर पर मनुष्यों से दूरी बनाकर रखता है। बाइसन अमूमन तभी हमला करता है जब उसे सामने से उकसाया जाए या वह खुद को किसी खतरे में महसूस करे। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि वन्यजीवों के व्यवहार का सटीक अनुमान हमेशा लगाना कठिन होता है, क्योंकि परिस्थितιवश वे पारंपरिक स्वभाव से अलग भी व्यवहार कर सकते हैं। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व, नर्मदापुरम प्रबंधन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में भी यह पुष्टि की गई थी कि गौर के अचानक हुए हमले में ही सेना के जवान की मृत्यु हुई थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सेना के कैंपस के अंदर जवान पर हमला करने वाला बाइसन अकेला था (जबकि बाइसन झुंड में रहना पसंद करते हैं, हालांकि वयस्क नर कई बार अकेले भी विचरण करते हैं)।


जंगल की ओर नहीं लौट रहे बाइसन, बढ़ रही है चिंता

शर्मा ने बताया कि सामान्य तौर पर बरसात के मौसम में बाइसन पचमढ़ी के आसपास दिखाई देते थे, और बारिश समाप्त होने के बाद वे वापस जंगल के अंदरूनी क्षेत्रों में लौट जाते थे। लेकिन इस बार कुछ स्थानों पर उनकी मौजूदगी लंबे समय तक बनी रही है। स्थानीय स्तर पर अनुमान लगाया जा रहा है कि जंगलों में अलग-अलग झुंडों के बीच दूरी बनाए रखने और भोजन-पानी की उपलब्धता जैसे कारणों से ये वन्यजीव जंगल के किनारे या आबादी के नजदीक ठहर रहे हैं। हालांकि, इस संबंध में किसी आधिकारिक वैज्ञानिक आकलन की पुष्टि अभी नहीं हुई है।


वन विभाग द्वारा उठाए गए कदम और सुरक्षा व्यवस्था

वन्यजीवों को शहर की ओर आने से रोकने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभाग पूरी तरह सतर्क है: पचमढ़ी और पिपरिया मार्ग सहित सभी संवेदनशील क्षेत्रों में वन्यजीवों की निगरानी के लिए चौबीस घंटे गश्त की व्यवस्था की गई है। अलग-अलग शिफ्टों में छह कर्मचारियों की विशेष टीम वाहनों के जरिए लगातार निगरानी रख रही है।


दीर्घकालिक समाधान और एहतियात

विशेषज्ञों का मानना है कि पचमढ़ी में जंगली जानवरों का शहर की सीमा तक पहुंचना केवल नागरिक सुरक्षा का नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक आवागमन (Natural Corridors) से भी जुड़ा है: फेंसिंग की उपयोगिता, वन्यजीवों के पारंपरिक रास्तों और संवेदनशील क्षेत्रों की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन किया जाना आवश्यक है। स्थानीय नागरिकों और पर्यटकों को सलाह दी गई है कि यदि उन्हें कोई वन्यजीव दिखाई दे, तो वे उससे सुरक्षित दूरी बनाए रखें और तुरंत वन विभाग को इसकी सूचना दें।