भोपाल। राजधानी भोपाल का चर्चित '90 डिग्री ब्रिज' विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। मध्य प्रदेश सरकार ने इस मामले में निलंबित किए गए लोक निर्माण विभाग (PWD) के सात इंजीनियरों को बहाल करने का बड़ा आदेश जारी किया है। लगभग एक साल की सस्पेंशन अवधि के बाद हुई इस बहाली ने प्रशासनिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि बहाली का मतलब 'क्लीन चिट' नहीं है और तीन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच अभी भी जारी रहेगी।


यह पूरा विवाद भोपाल के ऐशबाग इलाके में बने रेलवे ओवरब्रिज (ROB) से जुड़ा है। इस ब्रिज के निर्माण के दौरान इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं, जिसमें एक मोड़ बेहद तीखा नजर आ रहा था। आम जनता और विशेषज्ञों ने इसे '90 डिग्री का मोड़' बताते हुए इसे जानलेवा करार दिया था। विपक्ष के कड़े रुख और जनता के भारी विरोध के बाद 23 जून 2025 को सरकार ने कार्रवाई करते हुए डिजाइन और निर्माण से जुड़े सात इंजीनियरों को सस्पेंड कर दिया था।


मामले की तकनीकी जांच के बाद यह तथ्य सामने आया कि सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा एंगल वास्तव में 90 डिग्री नहीं, बल्कि करीब 119 डिग्री था। हालांकि, जांच रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि निर्माण के दौरान तकनीकी समन्वय और सुपरविजन (पर्यवेक्षण) की भारी कमी रही। रेलवे क्षेत्र में 'वाल टाइप पिलर' बनाए जाने को भी एक गंभीर तकनीकी त्रुटि माना गया, जिससे ब्रिज की बनावट विवादित और असुरक्षित दिखाई देने लगी थी।


सरकार द्वारा जारी ताजा आदेश के अनुसार, सभी सात इंजीनियरों को ईएनसी (EnC) कार्यालय में पदस्थ किया जाएगा। बहाली की प्रक्रिया दो श्रेणियों में बांटी गई है:

बिना जांच बहाली: संजय खांडे, शबाना रज्जाक और शानुल सक्सेना को बिना विभागीय जांच के बहाल कर दिया गया है। रिपोर्ट में इनके स्तर पर डिजाइन संबंधी किसी बड़ी गलती की पुष्टि नहीं हुई है।

जांच के घेरे में: जीपी वर्मा, रवि शुक्ला और उमाशंकर मिश्रा के खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) जारी रहेगी। इन पर निर्माण के दौरान तकनीकी लापरवाही बरतने के गंभीर आरोप हैं। माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया को पूरा होने में 4 से 5 महीने का समय लग सकता है।


तीन वरिष्ठ इंजीनियरों की जांच रिपोर्ट में यह बात प्रमुखता से कही गई है कि यदि निर्माण के समय विभाग का सुपरविजन बेहतर होता, तो डिजाइन को और अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाया जा सकता था। तकनीकी टीम और फील्ड इंजीनियरों के बीच तालमेल की कमी ने इस करोड़ों के प्रोजेक्ट को विवादों के घेरे में खड़ा कर दिया।


इंजीनियरों की बहाली की खबर आते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने फिर से सवाल उठाना शुरू कर दिया है। लोगों का कहना है कि क्या जांच पूरी होने से पहले बहाली करना सही है? वहीं, विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि नियमानुसार लंबे समय तक सस्पेंशन में रखना संभव नहीं था और दोषियों पर जांच की कार्रवाई निरंतर जारी है। फिलहाल, बहाल हुए सभी इंजीनियरों की नई नियुक्तियों ने विभाग के भीतर हलचल तेज कर दी है।