छतरपुर,विनोद मिश्रा। जिले में इस समय जल संकट ने भयावह रूप ले लिया है। शहर से महज 3 से 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित गांव—गौरैया और पठापुर—गंभीर पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। विकास के बड़े दावों के बीच इन गांवों की हकीकत यह है कि यहां के लोग पीने के पानी के लिए रोजाना 1 से 2 किलोमीटर दूर तक जाने को मजबूर हैं। करीब 1200 से 1500 की आबादी वाले इन गांवों में लगे 7 से 8 हैंडपंप या तो सूख चुके हैं या खराब पड़े हैं, जिससे हालात और भी खराब हो गए हैं।
गर्मी बढ़ने के साथ जल संकट और गहराता जा रहा है। महिलाओं की दिनचर्या पूरी तरह पानी के इंतजाम पर निर्भर हो गई है, वहीं बच्चे स्कूल से लौटने के बाद पढ़ाई छोड़कर पानी ढोने में लग जाते हैं। कई जगहों पर स्थिति इतनी खराब है कि ग्रामीण जंगलों की ‘झिरिया’ से गंदा पानी पीने को मजबूर हैं, जो मवेशियों के उपयोग में भी आता है।
बक्सवाहा क्षेत्र में इस संकट का सामाजिक असर भी साफ दिख रहा है। यहां पानी की कमी के चलते शादियां तक टल रही हैं और रोजगार की तलाश में लोगों का पलायन बढ़ता जा रहा है। हालात इतने खराब हैं कि ग्राम गौरैया में ग्रामीणों ने अपने घरों में पानी स्टोर करने के लिए टैंक बनवा लिए हैं, लेकिन उन्हें भरवाने के लिए 300 से 500 रुपए खर्च कर निजी टैंकर मंगवाने पड़ रहे हैं।
सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन और नल-जल योजनाएं जमीनी स्तर पर नाकाम नजर आ रही हैं। गांवों में पाइपलाइन तो बिछा दी गई, कनेक्शन भी दिए गए, लेकिन आज तक घरों में पानी नहीं पहुंचा। कई स्थानों पर पानी की टंकियों का निर्माण अधूरा पड़ा है और काम 20 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाया है। पाइपलाइन डालने के लिए खोदी गई सड़कें भी अब तक दुरुस्त नहीं की गईं, जिससे ग्रामीणों को दोहरी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
एक ओर जहां शहर में पचेर घाट और बूढ़ा बांध के फिल्टर प्लांट से नियमित रूप से पानी की सप्लाई की जा रही है, वहीं ग्रामीण इलाकों में बुनियादी जरूरत भी पूरी नहीं हो पा रही। पचेर घाट स्थित प्लांट से रोजाना लगभग 1.20 लाख लीटर पानी 20 वार्डों के करीब 24 हजार परिवारों तक पहुंचाया जा रहा है। अब बूढ़ा बांध में भी आधुनिक लैब के जरिए पानी की जांच शुरू हो गई है, जिससे शहर में सप्लाई होने वाले पानी की गुणवत्ता में सुधार आया है। पहले जहां पानी का टीडीएस 500 के पार रहता था, अब यह घटकर 60 से 120 के बीच आ गया है।
नगर पालिका द्वारा अमृत जल योजना के तहत शहर में 14 टंकियों के जरिए पानी सप्लाई किया जा रहा है, जिनकी कुल क्षमता एक करोड़ लीटर है। बूढ़ा बांध के इंटेकवेल की क्षमता 60 लाख लीटर प्रतिदिन है, जिससे शहर के करीब 20 हजार घरों तक पानी पहुंचाने की योजना है। इसके अलावा धसान नदी के पचेर घाट और खौंप तालाब से भी पानी की आपूर्ति की जा रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में हालात इतने बदतर हैं कि महिलाएं घूंघट में कई किलोमीटर दूर से पानी ढो रही हैं, जबकि दिव्यांग लोग ट्राईसाइकिल के सहारे पानी लाने को मजबूर हैं। यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
लोगों को केन-बेतवा लिंक परियोजना से उम्मीद जरूर है, लेकिन फिलहाल राहत दूर नजर आ रही है। बढ़ती गर्मी और 43 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचते तापमान ने इस संकट को और भयावह बना दिया है। ऐसे में छतरपुर के ग्रामीण इलाकों में जल संकट सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि जीवन, शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला बड़ा संकट बन चुका है।

