नई दिल्ली, 9 मई । सेलेस्टियल नेविगेशन एक आधुनिक तकनीक है, जो स्पेसक्राफ्ट को अपना सही स्थान पता करने में मदद करती है। इसमें सौर मंडल के तारों, ग्रहों, चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों की तस्वीरों का उपयोग किया जाता है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा की यह तकनीक खासतौर पर चंद्रमा के आसपास और डीप स्पेस के मिशनों के लिए काम करती है।

यह तकनीक स्पेसक्राफ्ट को स्वायत्त रूप से नेविगेट करने में सक्षम बनाती है। सेलेस्टियल नेविगेशन को चलाने के लिए सिर्फ एक कैमरा और एक प्रोसेसर की जरूरत पड़ती है। इससे मिशन के दौरान जमीन पर स्थित स्टेशनों पर निर्भरता काफी कम हो जाती है।

नासा के अनुसार, यह तकनीक कई महत्वपूर्ण फायदे देती है। सबसे पहले तो सेलेस्टियल नेविगेशन स्पेसक्राफ्ट को सुरक्षित रूप से चलाने में मदद करती है क्योंकि इसमें पृथ्वी से लगातार संपर्क की जरूरत नहीं पड़ती। खासकर तब जब पृथ्वी और स्पेसक्राफ्ट के बीच बहुत ज्यादा दूरी हो और संदेश पहुंचने में काफी समय लगता हो। यह छोटे-छोटे मिशनों के लिए भी उपयोगी है क्योंकि डीप स्पेस नेटवर्क (डाएसएन) का समय बहुत महंगा होता है।

सेलेस्टियल नेविगेशन की मदद से मिशन अपना ज्यादातर समय डेटा भेजने पर लगा सकते हैं। इसके अलावा, यह रेडियो ट्रैकिंग के साथ अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती है। नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम और अन्य चंद्रमा मिशनों के लिए यह बहुत उपयोगी साबित होती रही है।

अब सवाल है कि सेलेस्टियल नेविगेशन कैसे काम करती है? वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तकनीक नासा के ऑटो एनजीसी यानी ऑटोनॉमस नेविगेशन गाइडंस एंड कंट्रोल सॉफ्टवेयर सूट का हिस्सा है। ऑटो एनजीसी को कोर फ्लाइट सिस्टम (सीएफएस) पर बनाया गया है। इसमें सीजीआईएएनटी नामक टूल का इस्तेमाल होता है जो तस्वीरों का विश्लेषण करता है।

यह टूल स्पेसक्राफ्ट से ली गई 2डी तस्वीरों में दिखने वाले कई खगोलीय पिंडों की दिशा मापता है। इन मापों को जीईओएनएस नामक नेविगेशन सिस्टम में भेजा जाता है, जो स्पेसक्राफ्ट को सही जगह पर रखने के लिए गणना करता है। यह पूरी प्रक्रिया ऑनबोर्ड होती है, यानी स्पेसक्राफ्ट खुद ही सब कुछ करता है।