अजयगढ़ (पन्ना), मो. मुस्तकीम। सरकारी फाइलों में जिस 'विकास' को आंकड़ों और विज्ञापनों से सजाया जाता है, उसकी सबसे वीभत्स और हृदयविदारक तस्वीर पन्ना के मझगाय बांध डूब क्षेत्र से सामने आई है। यहाँ केन-बेतवा लिंक परियोजना, मझगाय बांध, रुंझ बांध और सिंगरौली–ललितपुर रेलवे लाइन के विस्थापन, भ्रष्टाचार और मुआवजे की अनदेखी के खिलाफ आदिवासी पिछले पांच दिनों से पानी में लकड़ियों की 'सांकेतिक चिताएं' सजाकर लेटे हुए थे। हुक्मरानों का दिल तो नहीं पसीजा, लेकिन व्यवस्था की इस बेरुखी ने आज उसी आंदोलन के बीच एक वास्तविक चिता जला दी।
वनहरीकला टपरिया निवासी रमिया बाई (पति बुद्धू आदिवासी) की बुधवार तड़के करीब 2 बजे मौत हो गई। उनकी मौत ने विस्थापन और पुनर्वास के तमाम सरकारी दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
"घर डूब रहा है, मैं कहां जाऊं?"- आखिरी सांस तक गूंजती रही बेबसी
परिजनों और आंदोलनकारियों के मुताबिक, रमिया बाई लंबे समय से गहरे मानसिक सदमे में थीं। करीब चार महीने पहले प्रशासन ने बिना किसी पुनर्वास और बिना उचित मुआवजा दिए उनका आशियाना बुलडोजर चलाकर जमींदोज कर दिया था। पिछले कुछ दिनों से जब बांध का पानी तेजी से गांव और खंडहर हो चुके घरों को लीलने लगा, तो बेघर रमिया की रातों की नींद और दिन का चैन पूरी तरह छिन गया।
मौत से महज दो-तीन दिन पहले सामने आए एक वीडियो में रमिया बदहवास होकर रोते हुए कह रही थीं— "मेरा घर डूब रहा है, मैं कहां जाऊंगी? गले के नीचे खाना नहीं उतरता।" चार दिन से भूखी-प्यासी और खौफ के साए में जी रही बुजुर्ग आदिवासी महिला ने आखिरकार अंधी व्यवस्था के आगे दम तोड़ दिया।
घोषित ₹12.50 लाख के पैकेज का भी अता-पता नहीं
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने इस घटना को 'प्रशासनिक हत्या' करार दिया है। भटनागर का आरोप है कि बड़ी परियोजनाओं के नाम पर पर्यावरण और विस्थापितों के मानवाधिकारों का खुला हनन हो रहा है। प्रशासन ने विस्थापितों के लिए घोषित ₹12.50 लाख के पुनर्वास पैकेज तक का पूरा भुगतान नहीं किया है। कई परिवारों की ज़मीन और मकान का मुआवजा महीनों से लंबित है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने विस्थापितों की मदद करने के बजाय आंदोलन को कुचलने के लिए इलाके की बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं तक बंद कर दी हैं। उन्होंने रमिया बाई की मौत की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
पटवारी का सरकार पर सीधा हमला: 'यह सरकारी हत्या है'
रमिया बाई की मौत के बाद मध्य प्रदेश की सियासत में भूचाल आ गया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए इसे सीधे तौर पर 'सरकारी हत्या' बताया।
पटवारी ने सोशल मीडिया पर तीखा हमला बोलते हुए लिखा—
"केन-बेतवा लिंक परियोजना से पीड़ित आदिवासी परिवार पन्ना में नदी में जिंदा चिता बनाकर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन के पांचवें दिन बुजुर्ग महिला रमिया की मौत हो गई, जो मुआवजा न मिलने और घर टूटने के सदमे में थीं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी, करीब 400 लोग लकड़ियों पर लेटकर जल-सत्याग्रह कर रहे हैं और सरकार मौन है। यह सरकारी हत्या है और मध्य प्रदेश का आदिवासी समाज सत्ता के इन अत्याचारों का पूरा हिसाब लेगा।"

वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाले नीति-नियंताओं के लिए विस्थापन महज एक प्रशासनिक औपचारिकता हो सकता है, लेकिन किसी गरीब के लिए उसकी छत छिन जाना जिंदगी छिन जाने जैसा है। जब तक आदिवासियों की जमीनों पर बनने वाले बांधों की कीमत गरीबों की जान से चुकाई जाएगी, तब तक किसी भी परियोजना को 'विकास' नहीं कहा जा सकता।




