ईटानगर, 8 मई । अरुणाचल प्रदेश के डी. एरिंग मेमोरियल वन्यजीव अभयारण्य में लगभग दो दशकों में पहली बार एक रॉयल बंगाल टाइगर को देखा गया है। अधिकारियों ने शुक्रवार को पासीघाट के पास अभयारण्य के भीतर जमा किए गए कैमरा ट्रैप सबूतों के आधार पर इसकी पुष्टि की।अरुणाचल प्रदेश वन और वन्यजीव विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि वन्यजीव अभयारण्य में किए गए कैमरा ट्रैप सर्वे के जरिए बाघ के दिखने की घटना को कैमरे में कैद किया गया है। इस सर्वे में 'अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट' (एटीआरईई) से तकनीकी सहायता ली गई थी।

उन्होंने बताया कि डीईएमडब्ल्यूएस के अंदर बाघ के होने का आखिरी पुख्ता सबूत 2005 में मिला था, और उसके बाद 2007-08 तक सिर्फ ऐसी रिपोर्टें मिली थीं, जिनकी पुष्टि नहीं हो पाई थी। अधिकारी ने कहा कि कैमरा ट्रैप से मिलीं ताजा तस्वीरों से इस इलाके में बाघ की मौजूदगी पूरी तरह से साबित हो गई है।

2014 में वर्ल्ड वाइड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) फॉर नेचर द्वारा प्रकाशित एक बेसलाइन सर्वे में एक निराशाजनक तस्वीर सामने आई थी। इसमें बाघों के कोई पगमार्क या कैमरा ट्रैप से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिला था, और उनके गायब होने की संभावित वजह शिकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर किए जा रहे शिकार को बताया गया था।

आस-पास के बड़े इलाके में बाघों की हलचल फिर से शुरू होने के संकेत पहले से ही मिल रहे थे। हाल ही में, जनवरी 2026 में, असम के जोनाई वन रेंज के वनकर्मियों ने कोबू चापोरी में एक वयस्क रॉयल बंगाल टाइगर के पगमार्क देखे जाने की सूचना दी।

कोबू चापोरी एक प्रस्तावित आरक्षित वन है, जो अभयारण्य से सटा हुआ है और असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा पर स्थित है। डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर केम्पी एटे ने इस पल को बेहद भावुक करने वाला बताया।

उन्होंने कहा, “लगभग दो दशकों के बाद बाघ की वापसी, हमारे इकोसिस्टम की जीवटता और जमीनी स्तर पर किए गए लगातार संरक्षण प्रयासों के मिले-जुले असर को दर्शाती है।”

उन्होंने इस इलाके की सुरक्षा में अपनी लगातार भूमिका निभाने के लिए फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों, इको-डेवलपमेंट कमेटियों और स्थानीय सामुदायिक संगठनों को इसका श्रेय दिया।

हाल के सर्वे में गंभीर रूप से लुप्तप्राय चीनी पैंगोलिन और दुर्लभ व लुप्तप्राय हिस्पिड खरगोश को भी देखा गया, जिससे अभयारण्य के अनोखे नदी-तटीय घास के मैदान वाले इकोसिस्टम का पारिस्थितिक महत्व और भी पुख्ता हो गया है। अरुणाचल प्रदेश के संरक्षित क्षेत्रों में यह अपनी तरह का एकमात्र इकोसिस्टम है।

पिछले एक साल में, वन अधिकारियों ने कुछ ऐसे अप्रत्यक्ष संकेत देखे थे, जिनसे पता चलता था कि इस इलाके में बाघों की आवाजाही हो सकती है। पहले के निगरानी दौरों में कोई फोटोग्राफिक सबूत नहीं मिला था, लेकिन अधिकारियों ने नए जोश और लगन के साथ अपनी कोशिशें जारी रखीं, और आखिरकार उस बड़े शिकारी जानवर को कैमरे में कैद कर लिया।

एक वन्यजीव विशेषज्ञ ने कहा, "यह हमारे लिए बहुत अच्छी खबर है। वन्यजीव अभयारण्य में रॉयल बंगाल टाइगर की वापसी से पर्यटक इस अभयारण्य को देखने के लिए आकर्षित होंगे। हम इस खबर से बहुत खुश हैं।"