विश्व में चल रहे वर्तमान संघर्ष के लिए भविष्यवक्ताओं ने बहुत पहले ही सचेत कर दिया था। परिस्थितियों से लेकर परिणामों तक की विवेचनायें निरंतर सामने आती रहीं। इन भविष्यवाणियों के अनेक बिन्दु अतीत में प्रमाणित भी होते रहे परन्तु तब आधुनिकता की चमक में डूबे लोगों ने अंधविश्वास कह कर इसका मुखौल ही उडाया है। वर्तमान समय में जनसंख्या के बढते दबाव के कारण अहंकार भी चरम सीमा पर पहुंच गया है। शासक बनने की होड ने युद्ध के हालात निर्मित कर दिये हैं। भारतीय आदिग्रन्थों सहित विदेश के अनेक भविष्यवक्ताओं ने इस युद्ध और उसके विस्तार को लेकर क्रमबद्ध विस्तार की घोषणायें पहले से ही हैं। भारत की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है। युद्ध का विस्तार केवल ईरान-अमेरिका-इजरायल, रूस-यूक्रेन, पाकिस्तान-अफगानस्तान जैसी स्थितियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि चीन-ताइवान, भारत-पाकिस्तान, भारत-बंगलादेश सहित खाडी के अनेक देश युद्ध के मुहाने पर खडे है। इन तनावों का युद्ध में परिवर्तित होने का समय की भी पूर्व घोषणायें की जा चुकीं हैं। प्राकृतिक प्रकोप, पर्यावरणीय समस्यायें, जीवन को पोषित करने वाली वस्तुओं का अकाल, खनिजों के अनुशासनहीन दोहन, वैचारिक नकारात्मकता, सत्य को सम्प्रदायों में विभक्त करके जीवन पद्धति थोपने के प्रयास, आस्था संकट की स्थितियां, आतंक के आधार पर सत्ता हथियाने की चालें जैसे अनगिनत कारक प्रकृति और जीवन को किस्तों में कत्ल करते रहे हैं परन्तु अब तो स्थितियां नियंत्रण के बाहर हो चुकीं हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थायें लगभग अस्तित्वहीन हो चुकीं हैं। कोरोना काल में विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनीसेफ जैसे उत्तरदायी समूहों द्वारा अपनाया गया पक्षपातपूर्ण रवैया किसी से छुपा नहीं है। भय का मनोविज्ञान ठहाके लगा रहा है। चारों ओर शक्ति के प्रदर्शन से गुलामों की संख्या बढाने की पहल रही है। अग्नेय शस्त्रों की बाढ आ गई है। मिसाइलों की बौछारों से न केवल जन-जीवन समाप्त हो रहा है बल्कि पर्यावरणीय स्थिति भी असंतुलित होकर हाहाकार कर रही है। परमाणु परीक्षणों की प्रतिस्पर्धा में नित नये आंकडे आ रहे हैं। संसार के ठेकेदार बनने वाले विस्तारवादी देशों की कुटिलता ने तूफानी गति पकड ली है। ऐसे में संसार के लगभग सभी देशों में आंतरिक कलह, गृह युद्ध और विघटन की स्थितियां निर्मित करने में कट्टरवादियों की बडी जमातें अपने विदेशी आकाओं की इच्छापूर्ति में तन, मन और धन से लगीं हुईं हैं। आतंकवादी संगठनों को पोषित करने वाले राष्ट्र स्वयं को धर्म विशेष का मसीहा बनाकर प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसे में भारत की भूमिका पर सबकी नजरें लगी हुईं हैं। सनातन का वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष महोपनिषद के अध्याय 4 के श्लोक क्रमांक 71 में वर्णित है जिसमें समूचा संसार एक परिवार की तरह बताया गया है। इसी तरह गरुड़ पुराण के अध्याय 35.51 में सर्वे भवन्तु सुखिनः की अवधारणा को निरूपित किया गया है। प्रत्येक जीव मे दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियां होती है। जब दैवीय प्रवृत्तियों यानी सकारात्मकता का बाहुल्य होता है तब वह जीव देववत हो जाता है और जब उसमें आसुरी प्रवृत्तियों यानी नकाराकत्मकता का बाहुल्य होता है तब वही असुर बन जाता है। सभी जीव जन्म से देवता ही होते हैं जिन्हें बाद में परिवार के संस्कार, शिक्षा और वातावरण के आधार पर ही असुर बना जाता है। इस तरह की प्रवृत्तियों के कारण ही आज विश्व शान्ति के लिए सनातनी विचारधारा आवश्यक ही नहीं बल्कि नितांत आवश्यक है। सभी धर्म गुरुओं ने एक ही तरह से निराकार परमात्मा को परिभाषित किया है जिसमें ज्योति पुंज की आराधना का क्रम ही आस्था की पहली सीढी माना गया है। भविष्यवक्ताओं ने इसी ओर स्पष्ट संकेत किया है कि शान्ति, सुख और समृद्धि के लिए सभी जीवों को इसी तरह की अवधारणा का आलम्बन करना पडेगा। जनसंख्या वृद्धि की असंतुलनकारी स्थितियां, जीव की शोषणकारी प्रवृत्तियां और भौतिक संपदाओं का संग्रह ही विनाश की पटकथा लिखेगी। वैचारिक प्रदूषण ही रक्तरंजित स्थितियां निर्मित करेंगी। आपसी वैमनुष्यता का खुला तांडव होगा। सतमार्ग पर ले जाने वाली जमातें असत्य का मार्गदर्शन करेंगीं। जीवन के बाद की मनगढन्त कल्पनाओं को लुभावने शब्दों में परोसकर षड़यंत्रकारी अपना लक्ष्य भेदन करेंगे। इस तरह की अनेक भविष्यवाणियों का उल्लेख विभिन्न देशों के युगदृष्टाओं ने पहले ही कर दिया था। अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने 20 वीं सदी में ही 21 वीं सदी के उज्जवल भविष्य की घोषणा कर दी थी। बल्गेरिया के बाबा, फ्रांस के ज्योतिषाचार्य नोस्त्रदामस सहित यशायाह, यिर्मयाह, यहेजकेल, और दानियेल के अलावा पैगम्बर एडम, नूह, इब्राहिम, मूसा और ईसा आदि ने भी वर्तमान परिस्थितियों को संकेतों में व्यक्त किया था।भारत के ओड़िया साहित्य में महात्वपूर्ण स्थान रखने वाली भविष्य मालिका में तो भविष्य की चरणबद्ध घटनाओं का उल्लेख किया गया है। आने वाले समय का पूरा खाका सामने होने के बाद भी वास्तविकता की कीमत पर अत्याधुनिकीकरण को स्वीकारोक्ति दी जाती रही जो वर्तमान की विभीषिका के लिए उत्तरदायी है जिसका परिणाम समूचा संसार भुगतने की स्थिति में पहुंच गया है। ऐसे में वैचारिक क्रान्ति के बिना शान्ति की पुनर्स्थापना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। जब तक आम आवाम स्वयं आगे आकर सकारात्मकता को अंगीकार नहीं करेगा तब तक विश्व कल्याण का धरातली स्वरूप सामने आ ही नहीं सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
वैचारिक क्रान्ति के बिना शान्ति की पुनर्स्थापना असम्भव

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PeptechTime
22 मार्च 2026, 06:37 am IST
PeptechTime22 मार्च 2026, 06:37 am IST
