भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रशासन को केवल फाइलों और दफ्तरों तक सीमित न रखकर जनता के बीच ले जाने के लिए पूरी तरह गंभीर नजर आ रहे हैं। हाल ही में आयोजित कलेक्टर-कमिश्नर सम्मेलन और समीक्षा बैठकों में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट और सख्त निर्देश दिए हैं कि अफसर अब एयरकंडीशन कमरों से निकलकर गांवों और कस्बों की में रात्रि विश्राम कर लोगों की समस्याओं को जानें। सीएम की मंशा प्रशासन को जनता के प्रति संवेदनशील और जवाबदेह बनाने की है, ताकि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को मिल सके।


मुख्यमंत्री के निर्देशों का उद्देश्य बेहद स्पष्ट है, और वह यह है कि अधिकारी गांवों में जाकर रात्रि विश्राम करें, ग्रामीणों के साथ रात्रि चौपाल लगाकर उनकी समस्याओं को सीधे सुनें और गेहूं खरीदी, पेयजल आपूर्ति व अन्य सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत का जायजा लें। सीएम की इस पहल का मुख्य लक्ष्य समस्याओं का कागजी नहीं बल्कि मौके पर ही त्वरित समाधान ढूंढना है।


हाल ही में मुख्यमंत्री के इस विजन को अमलीजामा पहनाते हुए उज्जैन कलेक्टर रौशन सिंह और दतिया कलेक्टर स्वपनिल वानखेड़े गांवों में रात्रि विश्राम करने पहुंचे। इन कलेक्टरों की सादगी और ग्रामीणों के बीच जमीन पर बैठकर चर्चा करने वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही हैं, जिसकी जनता भी खूब सराहना कर रही है।


प्रशासन के इस बदले हुए रुख से ग्रामीणों में एक नई उम्मीद जगी है, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है। जब प्रदेश के मुखिया की मंशा साफ है और कुछ जिलों के अधिकारियों ने इसकी शुरुआत भी कर दी है, तो फिर बाकी जिलों के कलेक्टर अब तक फील्ड पर क्यों नहीं उतरे? जनता अब टकटकी लगाकर देख रही है कि उनके जिले का प्रशासन कब दफ्तरों की औपचारिकता छोड़कर उनके घर-आंगन तक पहुँचेगा। मुख्यमंत्री के इस सख्त आदेश के बाद अब अन्य जिलों के कलेक्टरों की सक्रियता पर सबकी निगाहें टिकी हैं।