मंदसौर, ललित शंकर धाकड़। परिवार की जिम्मेदारियों के साथ अपनी कला को साधना बनाकर मंदसौर में मधुबनी चित्रकला को नई पहचान देने का प्रयास कर रहीं सुनीता सिसोदिया इन दिनों गणेशोत्सव के अवसर पर भगवान श्रीगणेश के विभिन्न स्वरूपों को मधुबनी शैली में उकेर रही हैं। बिहार की पारंपरिक मधुबनी चित्रकला को उन्होंने पिछले 15 वर्षों से अपनी कला-साधना का हिस्सा बनाया है।
नीमच में मायका और विवाह के बाद मंदसौर में ससुराल होने के कारण सुनीता ने मंदसौर की धरती को ही अपनी कला का केंद्र बनाया। खास बात यह है कि उन्होंने मधुबनी चित्रकला का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया। यूट्यूब और पुराने चित्रों को देखकर उन्होंने इस कला की बारीकियां सीखीं और निरंतर अभ्यास के जरिए अपनी शैली विकसित की।
मधुबनी चित्रकला में महीन रेखाओं, पारंपरिक आकृतियों और आकर्षक रंगों का विशेष महत्व होता है। सुनीता अपनी कलाकृतियों में इन विशेषताओं का उपयोग करते हुए भगवान गणेश के अलग-अलग स्वरूपों को कागज पर उकेर रही हैं। उनके चित्रों में कलात्मक सुंदरता के साथ भगवान गणेश के प्रति उनकी आस्था और श्रद्धा भी दिखाई देती है।
सुनीता अपनी चित्रकारी के लिए आवश्यक सामग्री पुणे से मंगवाती हैं। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच चित्रकारी के लिए समय निकालना उनके लिए आसान नहीं रहा, लेकिन कला के प्रति जुनून ने उन्हें लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनके लिए चित्रकारी महज रंगों और रेखाओं का संयोजन नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं और आस्था को अभिव्यक्त करने का माध्यम है।
गणेशोत्सव के दौरान तैयार की जा रही उनकी कलाकृतियों में मधुबनी शैली के पारंपरिक स्वरूप के साथ गणपति की भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। सुनीता का मानना है कि हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई प्रतिभा जरूर होती है। जरूरत केवल उसे पहचानने, समय देने और निरंतर अभ्यास करने की है।
सुनीता की इच्छा अब मंदसौर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को भी मधुबनी चित्रकला के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुंचाने की है। वे भगवान पशुपतिनाथ मंदिर, शिवना नदी और मंदसौर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को अपनी कलाकृतियों में स्थान देना चाहती हैं। उनका प्रयास है कि युवा पीढ़ी भारतीय पारंपरिक कलाओं से जुड़े और अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की दिशा में आगे आए।
बिहार की पारंपरिक मधुबनी कला को मंदसौर की धरती पर जीवंत रखने का सुनीता का प्रयास यह संदेश देता है कि कला की कोई सीमा नहीं होती। लगन, मेहनत और आत्मविश्वास के साथ कलाकार अपनी प्रतिभा को किसी भी स्थान पर नई पहचान दे सकता है।











