छतरपुर,विनोद मिश्रा। छतरपुर शहर के जवाहर रोड स्थित मां खेरे की देवी मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। चैत्र नवरात्रि के अवसर पर यहां भक्ति का विशेष माहौल देखने को मिल रहा है, जहां सुबह से ही दर्शन के लिए लंबी कतारें लग रही हैं। मान्यता है कि यह मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना सिद्धपीठ है और नगर की रक्षा के लिए माता यहां विराजमान हुई थीं।
इतिहास के अनुसार इस मंदिर में मां खेरे की देवी की सिद्ध प्रतिमा की स्थापना लगभग 300 वर्ष पूर्व महाराजा छत्रसाल ने अपने गुरु की प्रेरणा से कराई थी। मंदिर परिसर में मां खेरे की देवी के साथ काल भैरव, बटुक भैरव और सूर्य भगवान भी विराजमान हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता की कृपा से पूरा बुंदेलखंड क्षेत्र आपदाओं से सुरक्षित रहता है।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में अखंड ज्योत प्रज्ज्वलित की जाती है, जो पूरे नौ दिनों तक निरंतर जलती रहती है। भक्त पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामनाएं माता के चरणों में अर्पित करते हैं। महिलाओं, युवाओं और परिवारों की बड़ी संख्या पारंपरिक वेशभूषा में यहां पहुंचकर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करती है।
मंदिर की सबसे खास परंपरा माता के बदलते स्वरूप हैं। प्रतिदिन माता को दिन में तीन अलग-अलग स्वरूपों में सजाया जाता है, जिससे तीन दिनों में नौ स्वरूपों के दर्शन होते हैं। माता के इन दिव्य श्रृंगारों को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। हर स्वरूप भक्तों के मन में श्रद्धा और भक्ति को और प्रगाढ़ करता है।
मंदिर के पुजारी मुन्ना महाराज के अनुसार यह परंपरा वर्षों पुरानी है और नवरात्रि में विशेष पूजा, आरती, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा परिसर भक्तिमय बना रहता है। यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि बुंदेली संस्कृति का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। विवाह के बाद नवविवाहित जोड़े यहां हाथे लगाने आते हैं, वहीं बच्चे के जन्म के बाद परिवारजन झूला-चंगेर लेकर माता का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।
नवरात्रि में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ यह दर्शाती है कि आधुनिक समय में भी लोकआस्था और परंपराओं की जड़ें कितनी मजबूत हैं। मां के दरबार में पहुंचने वाला हर श्रद्धालु विश्वास और भक्ति के साथ लौटता है, और यही इस प्राचीन मंदिर की सबसे बड़ी पहचान है।

