सहारा में फंसे मध्य प्रदेश के साढ़े 6 हजार करोड़, वापसी सिर्फ 355 करोड़, विधानसभा में गूँजा निवेशकों का दर्द

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भोपाल, जीतेन्द्र यादव । मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के आठवें दिन सहारा इंडिया समूह में फंसे लाखों निवेशकों की गाढ़ी कमाई का मुद्दा सदन में जोरदार तरीके से उठा। कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह ने प्रश्नकाल के दौरान सरकार को घेरते हुए निवेशकों के पैसे वापस दिलाने में हो रही देरी पर सवाल उठाए। सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर कर दिया है, जिससे साफ है कि प्रदेश के लाखों छोटे और मध्यम वर्ग के निवेशक आज भी अपनी जमा पूंजी के लिए भटक रहे हैं।
सदन में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश के निवेशकों के कुल 6,689 करोड़ रुपये सहारा की विभिन्न योजनाओं में फंसे हुए थे। चौंकाने वाली बात यह है कि लंबी कानूनी प्रक्रिया और दावों के बावजूद अब तक केवल 355 करोड़ रुपये ही निवेशकों को लौटाए जा सके हैं। विपक्ष ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे महज पांच प्रतिशत रिकवरी बताया और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। जयवर्धन सिंह ने आरोप लगाया कि रिकवरी की यह रफ्तार कछुआ चाल से भी धीमी है, जबकि निवेशकों में दैनिक मजदूरी करने वाले और छोटे दुकानदार शामिल हैं जिनकी पूरी बचत इस समूह में अटकी हुई है।
प्रश्नकाल के दौरान कार्रवाई के विवरण पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद नजर आए। राज्यमंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल ने बताया कि इस मामले में चार प्रमुख प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई हैं और सभी को मुरैना जिले की मुख्य एफआईआर के साथ समेकित (Consolidate) कर दिया गया है। हालांकि, जयवर्धन सिंह ने सरकारी दावों को चुनौती देते हुए कहा कि पिछले छह वर्षों में प्रदेश भर में कुल 123 एफआईआर दर्ज हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि गृह विभाग के पास इस मामले की समग्र जानकारी का अभाव है और कई महत्वपूर्ण मामलों में कार्रवाई अब भी लंबित है।
सदन में चर्चा के दौरान यह तथ्य सामने आया कि प्रदेश के लगभग 9 लाख से अधिक निवेशकों का पैसा सहारा समूह में फंसा हुआ है। विडंबना यह है कि इनमें से केवल 1 लाख 55 हजार आवेदकों के आवेदन ही अब तक प्रक्रिया में लिए गए हैं, जबकि हजारों निवेशक तकनीकी और कानूनी उलझनों के कारण आवेदन तक नहीं कर पा रहे हैं। विपक्ष ने मांग की है कि सरकार सहारा समूह से जुड़े सभी लंबित दावों की समयबद्ध जांच कराए और दर्ज सभी एफआईआर की सूची सार्वजनिक की जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे। साथ ही, उन्होंने इस देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की भी बात कही।
विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए राज्यमंत्री पटेल और संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने स्पष्ट किया कि यह पूरा मामला सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में है। सरकार का तर्क है कि प्रशासन की अपनी सीमाएं हैं और वे केवल अदालत के निर्देशों और उनके द्वारा तय की गई प्रक्रिया के अनुसार ही कदम उठा सकते हैं। सरकार ने आश्वासन दिया कि वे अदालती आदेशों के तहत निवेशकों को राहत दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन अंतिम निर्णय और भुगतान की प्रक्रिया शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देशों के आधार पर ही संचालित हो रही है।

