बद्रीनाथ। हिंदू धर्म में पितरों की आत्मा की शांति, तृप्ति और मोक्ष के लिए पिंडदान और श्राद्ध का विशेष महत्व बताया गया है। देश में कई ऐसे तीर्थ हैं, जहां पितरों के लिए श्राद्ध कर्म किए जाते हैं, लेकिन उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम के पास स्थित ब्रह्मकपाल को लेकर एक ऐसी खास मान्यता है, जो इसे दूसरे पिंडदान स्थलों से अलग बनाती है। कहा जाता है कि ब्रह्मकपाल में किया गया पिंडदान अंतिम माना जाता है। यहां पिंडदान करने के बाद उसी पूर्वज के लिए दोबारा पिंडदान करने की जरूरत नहीं रहती।
ब्रह्मकपाल बदरीनाथ मंदिर के पास अलकनंदा नदी के तट पर स्थित एक पवित्र स्थल है। यहां श्रद्धालु अपने दिवंगत परिजनों और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। यहां किए गए श्राद्ध कर्म को मोक्ष से जोड़ा जाता है।
ब्रह्मकपाल की महिमा से जुड़ी एक बेहद रोचक पौराणिक कथा भगवान शिव और ब्रह्मा जी से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, सृष्टि की रचना के समय भगवान ब्रह्मा के पांच मुख थे। एक समय उनके भीतर अहंकार उत्पन्न हो गया और उन्होंने स्वयं को सर्वोच्च मानना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि ब्रह्मा के इसी अहंकार को समाप्त करने के लिए भगवान शिव ने उनका पांचवां सिर काट दिया।
लेकिन इसके बाद भगवान शिव पर ब्रह्महत्या का दोष लग गया। ब्रह्मा का कटा हुआ सिर उनके हाथ से चिपक गया और काफी प्रयासों के बाद भी वह अलग नहीं हुआ। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए महादेव भिक्षाटन करते हुए विभिन्न स्थानों पर गए। जब भगवान शिव बदरी क्षेत्र पहुंचे तो ब्रह्मा का कपाल उनके हाथ से अलग होकर गिर गया। जिस स्थान से इस कथा को जोड़ा जाता है, वही आगे चलकर ब्रह्मकपाल कहलाया।
ब्रह्मकपाल की धार्मिक महिमा को पांडवों से जुड़ी मान्यताओं के साथ भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध में अपने ही संबंधियों के मारे जाने के बाद पांडवों के मन में पाप और दोष का भाव था। उन्होंने अपने मृत परिजनों और योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए विभिन्न धार्मिक कर्म किए।
मान्यता यह है कि ब्रह्मकपाल में विधि-विधान से श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। इसी विश्वास के कारण लोगों में यह धारणा प्रचलित है कि जिस पितर का पिंडदान ब्रह्मकपाल में हो गया, उसके लिए फिर कहीं और पिंडदान करने की आवश्यकता नहीं रहती। यही वजह है कि इसे पिंडदान का अंतिम या पूर्ण कर्म कहा जाता है।
पितृ पक्ष के दौरान ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है। लोग दूर-दूर से यहां पहुंचकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।













