नई दिल्ली। हरियाणा के फरीदाबाद में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) द्वारा किए गए एक सामुदायिक आधारित आयुर्वेद हस्तक्षेप से जीवन की गुणवत्ता, अग्निबल और बोन मिनरल डेंसिटी में सुधार देखा गया है।
आयुष मंत्रालय की ओर से मंगलवार को जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के आकलन में सकारात्मक बदलाव देखे गए। इसके साथ ही सेरोटोनिन, एसिटाइलकोलाइन, डीएचईए और विटामिन डी जैसे कुछ बायोमार्कर में भी सुधार पाया गया।
अपने पब्लिक हेल्थ इनिशिएटिव' (पीएचआई) के तहत एआईआईए ने फरीदाबाद जिले में 60 से 80 वर्ष की आयु के 5,594 लोगों की जांच की और उन्हें आयुर्वेदिक दवाएं दीं। इसके अलावा डिमेंशिया से जुड़े एक अलग हिस्से के तहत 200 मरीजों की जांच की गई और उन्हें चार महीने तक आयुर्वेद आधारित दवाएं दी गईं।
इन नतीजों को एआईआईए में आयोजित एक कार्यशाला में पेश किया गया और परियोजना की रिपोर्ट एक विशेषज्ञ समिति को सौंप दी गई है। परियोजना के पहले चरण में 60 दिनों के हस्तक्षेप के बाद जीवन की गुणवत्ता में सुधार देखा गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' (डब्ल्यूएचओक्यूओएल) आकलन में कुल स्कोर 292.0 से बढ़कर 326.3 हो गया।
'अग्निबल' (पाचन और चयापचय शक्ति से जुड़ी एक आयुर्वेदिक अवधारणा) का आकलन करने के लिए इस्तेमाल किए गए सभी छह पैमानों में भी सुधार देखा गया।
शुरुआती जांच में बुजुर्ग प्रतिभागियों में कई स्वास्थ्य समस्याएं सामने आईं, जैसे 67.73 प्रतिशत प्रतिभागियों में दृष्टि से जुड़ी समस्याएं, 43.05 प्रतिशत में शारीरिक निष्क्रियता और 6.85 प्रतिशत में संज्ञानात्मक कार्यक्षमता में कमी पाई गई।
अन्य समस्याओं में उच्च रक्तचाप, रक्त में ग्लूकोज का बढ़ा हुआ स्तर, हड्डियों के घनत्व में कमी, कब्ज और नींद से जुड़ी समस्याएं शामिल थीं।
मंत्रालय ने कहा कि इन नतीजों की पुष्टि करने और इन उपायों की प्रभावशीलता व सुरक्षा को साबित करने के लिए और अधिक व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन, निरंतर सुरक्षा निगरानी और आगे के अध्ययन की आवश्यकता है।
नई दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद (एआईआईए), आयुष मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। इसका उद्देश्य शिक्षा, अनुसंधान, क्लिनिकल सेवाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों के माध्यम से आयुर्वेद को आगे बढ़ाना है।
















