इस्लामाबाद। पाकिस्तान ने कभी अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी को क्षेत्र में अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा था, लेकिन अब यही उसके लिए लगातार सुरक्षा चुनौती बन गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान सरकार अपनी राजनीतिक सत्ता और सुरक्षा प्राथमिकताओं को पाकिस्तान के अधीन करने के लिए तैयार नहीं है। इसके चलते दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता गया और मामला सीधे सैन्य टकराव तक पहुंच गया।
कोलंबिया पॉलिटिकल रिव्यू में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक साल से अधिक समय से संघर्ष जारी है। जून में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में हवाई हमले किए थे। तालिबान ने इन हमलों में 13 नागरिकों की मौत और 14 लोगों के घायल होने का दावा किया था, जबकि पाकिस्तान ने कहा था कि उसने 26 आतंकवादियों को मार गिराया। दोनों देशों के बीच ऐसे विरोधाभासी दावे अब आम हो गए हैं। पाकिस्तान इन हमलों को आतंकवाद विरोधी कार्रवाई बताता है, जबकि अफगानिस्तान इन्हें नागरिकों पर हमला करार देता है।
रिपोर्ट में अनाया कय्यूम ने लिखा कि अफगानिस्तान पर अमेरिकी कब्जे के दौरान पाकिस्तान ने तालिबान को सुरक्षित ठिकाने और खुफिया सहायता उपलब्ध कराई थी। ऐसे में माना जा रहा था कि अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे। हालांकि, यह आकलन गलत साबित हुआ और दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव शुरू हो गया।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंधों में तनाव बढ़ने की एक प्रमुख वजह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के हमले हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि टीटीपी के आतंकवादी अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकानों से काम कर रहे हैं और पाकिस्तान में हमलों को अंजाम दे रहे हैं। इसके जवाब में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की सीमा के भीतर हवाई हमले किए और बिना दस्तावेजों के रह रहे अफगान शरणार्थियों को देश से बाहर निकालना शुरू कर दिया। इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान चाहता है कि अफगान तालिबान टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई करे। हालांकि, दोनों संगठनों के बीच वैचारिक समानता और उनके सदस्यों के आपसी संबंध इस मामले को जटिल बनाते हैं। इसके अलावा, पश्तून पहचान भी अहम भूमिका निभाती है। सीमा के दोनों ओर रहने वाले पश्तूनों के बीच जातीय संबंध आधिकारिक सीमा से परे हैं। ऐसे में तालिबान के लिए टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई करना अपने ही समुदाय के लोगों के साथ विश्वासघात जैसा माना जा सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में सत्ता की वैधता ऐतिहासिक रूप से विदेशी शक्तियों के नियंत्रण का विरोध करने से जुड़ी रही है। तालिबान खुद को स्वतंत्र इस्लामी राष्ट्रवादी संगठन के रूप में पेश करता है, जिसने अफगानिस्तान को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त कराया। ऐसे में पाकिस्तान का प्रभाव स्वीकार करना उसके राजनीतिक दावों के विपरीत हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान अब उस शासन के साथ सक्रिय संघर्ष में उलझ गया है, जिसे कभी वह अपना रणनीतिक सहयोगी मानता था। इस संघर्ष का खामियाजा अफगान नागरिकों को भी भुगतना पड़ रहा है। पाकिस्तान के हवाई हमलों के अलावा तालिबान शासन की नीतियों ने भी लोगों के सामने मुश्किलें खड़ी की हैं। तालिबान ने लड़कियों के माध्यमिक और उच्च शिक्षा हासिल करने पर रोक लगा रखी है।














